वैतथ्य प्रकरण - कारिका 30

एतैरैषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः ॥ ३० ॥

etairaiṣo’pṛthagbhāvaiḥ pṛthageveti lakṣitaḥ .
evaṃ yo veda tattvena kalpayetso’viśaṅkitaḥ .. 30 ..


[इस प्रकार सबका अधिष्ठान होनेके कारण] इन प्राणादि अपृथग् भावोंसे [पृथक् न होनेपर भी अज्ञानियोंद्वारा] यह आत्मा भिन्न ही माना गया है । इस बातको जो वास्तविकरूपसे जानता है वह निःशंक होकर [वेदार्थकी] कल्पना कर सकता है ॥ ३० ॥

रज्जुमें कल्पित सर्पादि भावोंसे रज्जुके समान यह आत्मा अपनेसे अपृथग्भूत प्राणादि अपृथग्भावोंसे पृथक् ही है—ऐसा मूर्खोंको लक्षित—अभिलक्षित अर्थात् निश्चित हो रहा है । विवेकियोंकी दृष्टिमें तो “यह जो कुछ है सब आत्मा ही है” इस श्रुतिके अनुसार रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान ये प्राणादि आत्मासे भिन्न हैं ही नहीं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।

इस प्रकार रज्जुमें कल्पित सर्पके समान जो आत्मामें कल्पित पदार्थोंका आत्माके सिवा असत्यत्व समझता है तथा आत्माको श्रुति और युक्तिसे परमार्थतः निर्विकल्प जानता है वह निःशंक होकर वेदार्थकी ‘यह वाक्य इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला है और यह अन्यार्थपरक है’ इस प्रकार विभागपूर्वक कल्पना कर सकता है—यह इसका तात्पर्य है । जो अध्यात्मतत्त्वको नहीं जानता वह पुरुष तत्त्वतः वेदोंको भी नहीं जान सकता । “अध्यात्मतत्त्वको न जाननेवाला पुरुष किसी भी कर्मफलको प्राप्त नहीं करता” ऐसा मनुजीका भी वचन है ॥ ३० ॥

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एतैः प्राणादिभिरात्मनोऽपृथग्भूतैरपृथग्भावैरेष आत्मा रज्जुरिव सर्पादिविकल्पनारूपैः पृथगेवेति लक्षितोऽभिलक्षितो निश्चितो मूढैरित्यर्थः । विवेकिनां तु रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयो नात्मव्यतिरेकेण प्राणादयः सन्तीत्यभिप्रायः “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) इति श्रुतेः ।

एवमात्मव्यतिरेकेणासत्त्वं रज्जुसर्पवदात्मनि कल्पितानामात्मानं च केवलं निर्विकल्पं यो वेद तत्त्वेन श्रुतितो युक्तितश्च सोऽविशङ्कितो वेदार्थं विभागतः कल्पयेत्कल्पयतीत्यर्थः—इदमेवंपरं वाक्यमदोऽन्यपरमिति । न ह्यनध्यात्मविद्वेदाज्ञातुं शक्नोति तत्त्वतः । “न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते” (मनु० ६ । ८२) इति हि मानवं वचनम् ॥ ३० ॥


द्वैतका असत्यत्व वेदान्तवेद्य है

यह जो युक्तिपूर्वक द्वैतकी असत्यता बतलायी है वह वेदान्तप्रमाणसे जानी गयी है—इस आशयसे कहते हैं—
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यदेतद्द्वैतस्यासत्त्वमुक्तं युक्तितस्तदेतद्वेदान्तप्रमाणावगतमित्याह—