वैतथ्य प्रकरण - कारिका 31

स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ ३१ ॥

svapnamāye yathā dṛṣṭe gandharvanagaraṃ yathā .
tathā viśvamidaṃ dṛṣṭaṃ vedānteṣu vicakṣaṇaiḥ .. 31 ..


जिस प्रकार स्वप्न और माया देखे गये हैं तथा जैसा गन्धर्वनगर जाना गया है, उसी प्रकार विचक्षण पुरुषोंने वेदान्तोंमें इस जगत्को देखा है ॥ ३१ ॥

अविवेकी पुरुषोंद्वारा स्वप्न और माया, जो असद्वस्तुरूप अर्थात् असत्य हैं, सद्वस्तुरूप देखे जाते हैं । जिस प्रकार विस्तृत दूकान, बाजार, गृह, प्रासाद और नगरनिवासी स्त्री-पुरुषोंके व्यवहारसे भरपूर-सा गन्धर्वनगर देखते-ही-देखते अकस्मात् अभावको प्राप्त होता देखा गया है और जिस प्रकार ये स्वप्न और माया असद्रूप देखे गये हैं, उसी प्रकार यह विश्व अर्थात् समस्त द्वैत असत् देखा गया है ।

कहाँ देखा गया है? इसपर कहते हैं—वेदान्तोंमें । “यहाँ नाना कुछ नहीं है” “इन्द्रने मायासे” “पहले यह आत्मा ही था” “पहले यह ब्रह्म ही था” “दूसरेसे निश्चय भय होता है” “उससे दूसरा कोई नहीं है” “जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है” इत्यादि वेदान्तोंमें विचक्षण अर्थात् निपुणतर वस्तुदर्शी पण्डितोंद्वारा देखा गया है—यह इसका तात्पर्य है ।

“यह जगत् अँधेरे गढ़े के समान और वर्षा की बूँद के सदृश नाशप्राय, सुख से रहित और नाश के अनन्तर अभाव को प्राप्त हो जानेवाला देखा गया है”—इस व्यासस्मृति से भी यही बात प्रमाणित होती है ॥ ३१ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्वप्नश्च माया च स्वप्नमाये असद्वस्त्वात्मिके असत्यौ सद्वस्त्वात्मिके इव लक्ष्येते अविवेकित्रिभिः । यथा च प्रसारितपण्यापणगृहप्रासादस्त्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्यमानमेव सदकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असद्रूपे, तथा विश्वमिदं द्वैतं समस्तमसद्दृष्टम् ।

क्वेत्याह—वेदान्तेषु । “नेह नानास्ति किञ्चन” (क० उ० २ । १ । ११, बृ० उ० ४ । ४ । १९) “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २ । ५ । १९) “आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १ । ४ । १७) “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १ । ४ । १०) ‘द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १ । ४ । २) “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० ४ । ५ । १५) इत्यादिषु विचक्षणैर्निपुणतरवस्तुदर्शिभिः पण्डितैरित्यर्थः ।

“तमःश्वभ्रनिभं दृष्टं वर्षबुद्बुदसंनिभम् । नाशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमभावगम्” इति व्यासस्मृतेः ॥ ३१ ॥


परमार्थ क्या है?

यह (आगेका) श्लोक इस प्रकरण के विषय का उपसंहार करने के लिये है । जबकि द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत् है तो यह निश्चित होता है कि यह सारा लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्या का ही विषय है । उस अवस्था में—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्रकरणार्थोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः । यदा वितथं द्वैतमात्मैवैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽविद्याविषय एवेति तदा—