न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ३२ ॥
na nirodho na cotpattirna baddho na ca sādhakaḥ .
na mumukṣurna vai mukta ityeṣā paramārthatā .. 32 ..
न निरोध है । निरोधन का नाम निरोध यानी प्रलय है । उत्पत्ति—जनन को, बद्ध—संसारी जीव को, साधक—मोक्ष के साधनवाले को, मुमुक्षु—मुक्त होने की इच्छावाले को और मुक्त—बन्धन से छूटे हुए को कहते हैं । उत्पत्ति और प्रलय का अभाव होने के कारण ये बद्ध आदि भी नहीं हैं—यही परमार्थता है ।
उत्पत्ति और प्रलय का अभाव किस प्रकार है? इसपर कहा जाता है—द्वैत की असत्यता होने के कारण [इनकी भी सत्ता नहीं है] । “जहाँ द्वैत-जैसा होता है” “जो यहाँ नानावत् देखता है” “यह सब आत्मा ही है” “यह सब ब्रह्म ही है” “एक ही अद्वितीय” “यह जो कुछ है सब आत्मा है” इत्यादि अनेकों श्रुतियों से द्वैत की असत्यता सिद्ध होती है ।
उत्पत्ति अथवा प्रलय सत् की ही हो सकती है, शशशृङ्गादि असद्वस्तु की नहीं हो सकती । इसी प्रकार अद्वैत वस्तु भी उत्पन्न या लीन नहीं होती । जो अद्वय हो वह उत्पत्ति-प्रलयवान् भी हो—यह तो सर्वथा विरुद्ध है ।
इसके सिवा जो प्राणादिरूप द्वैतव्यवहार है वह रज्जु में सर्प के समान आत्मा में ही कल्पित है—यह बात पहले कही जा चुकी है । रज्जुसर्पादिरूप मनोविकल्प की भी रज्जु में उत्पत्ति या प्रलय नहीं होती । रज्जुसर्प की उत्पत्ति या प्रलय न तो मन में ही होती है और न [मन और रज्जु] दोनोंही में । इसी प्रकार द्वैत का मनोमयत्व भी समान ही है, क्योंकि मन के समाहित अथवा सुषुप्त हो जाने पर द्वैत का ग्रहण नहीं होता ।
अतः यह सिद्ध हुआ कि द्वैत मन की कल्पनामात्र है । इसलिये यह ठीक ही कहा है कि द्वैत की असत्यता होने के कारण निरोधादि का अभाव ही परमार्थता है ।
पूर्व०—यदि ऐसा है तो शास्त्र का व्यापार द्वैत का अभाव प्रतिपादन करने में ही है, अद्वैत-बोध में नहीं; क्योंकि इससे विरोध आता है ।[ * ] ऐसी अवस्था में अद्वैत के वस्तुत्व में कोई प्रमाण न होने के कारण शून्यवाद का प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि द्वैत का तो अभाव ही है ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि रज्जु-सर्पादि विकल्प का निराधार होना सम्भव नहीं है—इस प्रकार पहले निराकरण कर दिये जाने पर भी इसी शंका को फिर क्यों उठाता है? इसपर [शून्यवादी] कहता है—‘सर्पभ्रम की अधिष्ठानभूता रज्जु भी कल्पिता ही है । इसलिये यह दृष्टान्त ठीक नहीं है ।’
सिद्धान्ती—नहीं, कल्पना का क्षय हो जाने पर अविकल्पित आत्मा की सत्ता उसके अविकल्पितत्व के कारण ही सम्भव हो सकती है । यदि कहो कि रज्जु-सर्प के समान उसकी असत्ता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह अविकल्पित रज्जु-अंश के समान सर्पाभाव के विज्ञान के पहले से ही सर्वथा अविकल्पितरूप से विद्यमान है । इसके सिवा, जो विकल्पना करनेवाला होता है उसे विकल्प की उत्पत्ति से पहले ही विद्यमान स्वीकार करने के कारण उसकी असत्ता नहीं मानी जा सकती ।
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न निरोधः—निरोधनं निरोधः प्रलयः, उत्पत्तिर्जननम्, बद्धः संसारी जीवः, साधकः साधनवान्मोक्षस्य, मुमुक्षुर्मोचनार्थी, मुक्तो विमुक्तबन्धः । उत्पत्तिप्रलययोरभावाद्बद्धादयो न सन्तीत्येषा परमार्थता ।
कथमुत्पत्तिप्रलययोरभावः, इत्युच्यते, द्वैतस्यासत्त्वात् । “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (बृ० उ० २ । ४ । १४) “य इह नानेव पश्यति” (क० उ० २ । १ । १०, ११) ‘आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) “ब्रह्मैवेदं सर्वम्” (नृसिंहोत्तर० ७) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । १) “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) इत्यादिनानाश्रुतिभ्यो द्वैतस्यासत्त्वं सिद्धम् ।
सतो ह्युत्पत्तिः प्रलयो वा स्यान्नासतः शशविषाणादेः । नाप्यद्वैतमुत्पद्यते लीयते वा । अद्वयं चोत्पत्तिप्रलयवच्चेति विप्रतिषिद्धम् ।
यस्तु पुनर्द्वैतसंव्यवहारः स रज्जुसर्पवदात्मनि प्राणादिलक्षणः कल्पित इत्युक्तम् । न हि मनोविकल्पनाया रज्जुसर्पादिलक्षणाया रज्ज्वां प्रलय उत्पत्तिर्वा । न च मनसि रज्जुसर्पस्योत्पत्तिः प्रलयो वा न चोभयतो वा । तथा मानसत्वाविशेषाद्द्वैतस्य । न हि नियते मनसि सुषुप्ते वा द्वैतं गृह्यते ।
अतो मनोविकल्पनामात्रं द्वैतमिति सिद्धम् । तस्मात्सूक्तं द्वैतस्यासत्त्वान्निरोधाद्यभावः परमार्थतेति ।
यद्येवं द्वैताभावे शास्त्रव्यापारो शून्यवादशङ्का नाद्वैते विरोधात् । तन्निवर्त्तनञ्च तथा च सत्यद्वैतस्य वस्तुत्वे प्रमाणाभावाच्छून्यवादप्रसङ्गः, द्वैतस्य चाभावात् ।
न; रज्जुसर्पादिविकल्पनाया निरास्पदत्वानुपपत्तिरिति प्रत्युक्तमेतत्कथमुज्जीवयसीत्याह—रज्जुरपि सर्पविकल्पस्यास्पदभूता विकल्पितैवेति दृष्टान्तानुपपत्तिः ।
न, विकल्पनाक्षयेऽविकल्पितस्याविकल्पितत्वादेव सत्त्वोपपत्तेः । रज्जुसर्पवदसत्त्वमिति चेत्? न; एकान्तेनाविकल्पितत्वा- दविकल्पितरज्ज्वांशवत्प्राक् सर्पाभावविज्ञानात् । विकल्पयितुश्च प्राग्विकल्पनोत्पत्तेः सिद्धत्वाभ्युपगमादसत्त्वानुपपत्तिः ।
पूर्व०—किन्तु आत्मस्वरूप में प्रमाण की गति न होने पर भी शास्त्र द्वैतविज्ञान का निवर्त्तक कैसे है?
सिद्धान्ती—[यहाँ] यह दोष नहीं है, क्योंकि रज्जु में सर्पादि के समान आत्मा में अविद्या के कारण द्वैत का अध्यास है । किस प्रकार? —‘मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, मूढ़ हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, मरा हूँ, जराग्रस्त हूँ, देहधारी हूँ, देखता हूँ, व्यक्त हूँ, अव्यक्त हूँ, कर्ता हूँ, फलवान् हूँ, संयुक्त हूँ, वियुक्त हूँ, क्षीण हूँ, वृद्ध हूँ, ये मेरे हैं’—इत्यादि प्रकार के सम्पूर्ण विकल्प आत्मा में आरोपित किये जाते हैं तथा आत्मा इनमें अनुस्यूत है, क्योंकि उसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है, जैसे कि सर्प और धारा आदि भेदों में रज्जु ।
जब कि ऐसी बात है तो विशेष्यरूप ब्रह्म के स्वरूप की प्रतीति सिद्ध होने के कारण उसके सम्बन्ध में शास्त्र को कुछ कर्तव्य नहीं है । शास्त्र तो असिद्ध वस्तु को सिद्ध करनेवाला है; सिद्ध वस्तु का अनुवाद करने से वह प्रमाण नहीं माना जाता । क्योंकि अविद्या से आरोपित सुखित्व आदि विशेष प्रतिबन्धकों के कारण ही आत्मा की स्वरूप से स्थिति नहीं है और स्वरूप से स्थिति ही श्रेय है; इसलिये ‘नेति-नेति’ और ‘अस्थूलम्’ आदि वाक्यों से आत्मा में असुखित्वादि की प्रतीति कराने के द्वारा शास्त्र [उसमें आरोपित] सुखित्व आदि की निवृत्ति करनेवाला है । आत्मस्वरूप के समान असुखित्व आदि भी सुखित्व आदि भेदों में अनुवृत्त धर्म नहीं है । यदि वह भी अनुवृत्त होता तो उसमें सुखित्व आदिरूप विशेष धर्म का आरोप नहीं किया जा सकता था, जिस प्रकार कि उष्णत्वधर्मविशिष्ट अग्नि में शीतत्व का आरोप नहीं किया जा सकता । अतः सुखित्वादि विशेष निर्विशेष आत्मा में ही कल्पना किये गये हैं । इससे सिद्ध हुआ कि आत्मा के विषय में जो असुखित्व आदि शास्त्र है वह सुखित्व आदि विशेष की निवृत्ति के ही लिये है । शास्त्रवेत्ताओं का सूत्र भी है—“ [सुखित्व आदि धर्मों का] निवर्त्तक होने से [अस्थूलम् आदि] शास्त्र की प्रामाणिकता सिद्ध होती है ” ॥ ३२ ॥
[ * ]: क्योंकि द्वैत का अभाव प्रतिपादन करने से ही यह नहीं समझा जा सकता कि शास्त्र को अद्वैत की सत्ता अभीष्ट है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कथं पुनः स्वरूपे व्यापाराभावे शास्त्रस्य द्वैतविज्ञाननिवर्तकत्वम्?
नैष दोषः । रज्ज्वां सर्पादिवदात्मनि द्वैतस्याविद्याध्यस्तत्वात् । कथम्? सुख्यहं दुःखी मूढो जातो मृतो जीर्णो देहवान् पश्यामि व्यक्तोऽव्यक्तः कर्ता फली संयुक्तो वियुक्तः क्षीणो वृद्धोऽहं ममैत इत्येवमादयः सर्व आत्मन्यध्यारोप्यन्ते । आत्मैतेष्वनुगतः सर्वत्राव्यभिचारात् । यथा सर्पधारादिभेदेषु रज्जुः ।
यदा चैवं विशेष्यस्वरूपप्रत्ययस्य सिद्धत्वान्न कर्तव्यत्वं शास्त्रेण । अकृतकर्तृ च शास्त्रं कृतानुकारित्वेऽप्रमाणम् । यतोऽविद्याध्यारोपितसुखित्वादिविशेषप्रतिबन्धादेवात्मनः स्वरूपेणानवस्थानं स्वरूपावस्थानं च श्रेय इति सुखित्वादिनिवर्तकं शास्त्रम् आत्मन्यसुखित्वादिप्रत्ययकरणेन नेति नेत्यस्थूलादिवाक्यैः । आत्मस्वरूपवदसुखित्वाद्यपि सुखित्वादिभेदेषु नानुवृत्तोऽस्ति धर्मः । यद्यनुवृत्तः स्यान्नाध्यारोपितसुखित्वादिलक्षणो विशेषः । यथोष्णत्वगुणविशेषवत्यग्नौ शीतता । तस्मान्निर्विशेष एवात्मनि सुखित्वादयो विशेषाः कल्पिताः । यत्त्वसुखित्वादिशास्त्रमात्मनस्तत्सुखित्वादिविशेषनिवृत्त्यर्थमेवेति सिद्धम् । “सिद्धं तु निवर्तकत्वात्” इत्यागमविदां सूत्रम् ॥ ३२ ॥