भावा अप्यद्वयेनैव तस्मादद्वयता शिवा ॥ ३३ ॥
bhāvairasadbhirevāyamadvayena ca kalpitaḥ .
bhāvā apyadvayenaiva tasmādadvayatā śivā .. 33 ..
जिस प्रकार रज्जु में अविद्यमान सर्प धारा आदि भावों से तथा विद्यमान अद्वितीय रज्जुद्रव्य से ‘यह सर्प है, यह धारा है, यह दण्ड है’ इस प्रकार रज्जुद्रव्य ही कल्पना किया जाता है, उसी प्रकार प्राणादि अनन्त असत्—अविद्यमान अर्थात् जो परमार्थतः नहीं हैं, [उन भावों से आत्मा विकल्पित हो रहा है]—क्योंकि चित्त के चलायमान न होने पर किसी के द्वारा कोई भाव उपलक्षित नहीं हो सकता और आत्मा में प्रचलन है नहीं; तथा केवल चलायमान चित्त में ही उपलब्ध होनेवाले भाव परमार्थतः सत्य हैं—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । अतः यह आत्मा, स्वयं एकमात्र सत्स्वभाव होने पर भी असत्स्वरूप प्राणादि भावों से तथा रज्जु के समान सब प्रकार के विकल्प के आश्रयभूत परमार्थ सत् आत्मस्वरूप से कल्पित है ।
वे प्राणादि भाव भी अद्वय सत्स्वरूप आत्मा से ही कल्पना किये गये हैं, क्योंकि कोई भी कल्पना निराधार नहीं हो सकती । अतः समस्त कल्पना की आश्रयभूता होने से और अपने स्वरूप से अद्वय का कभी व्यभिचार न होने से कल्पना-अवस्था में भी अद्वयता ही मङ्गलमयी है । केवल कल्पना ही अमङ्गलमयी है । क्योंकि वह रज्जुसर्पादि के समान भय आदि उत्पन्न करनेवाली है । अद्वयता अभयरूपा है, इसलिये वही मङ्गलमयी है ॥ ३३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा रज्ज्वामसद्भिः सर्पधारादिभिरद्वयेन च रज्जुद्रव्येण सतायं सर्प इयं धारा दण्डोऽयमिति वा रज्जुद्रव्यमेव कल्प्यत एवं प्राणादिभिरनन्तैरसद्भिरेवाविद्यमानैः, न परमार्थतः—न ह्यप्रचलिते मनसि कश्चिद्भाव उपलक्षयितुं शक्यते केनचित्; न चात्मनः प्रचलनमस्ति; प्रचलितस्यैवोपलभ्यमाना भावा न परमार्थतः सन्तः कल्पयितुं शक्याः—अतोऽसद्भिरेव प्राणादिभावैरद्वयेन च परमार्थसतात्मना रज्जुवत्सर्वविकल्पास्पदभूतेनायं स्वयमेवात्मा कल्पितः; सदैकस्वभावोऽपि सन् ।
ते च प्राणादिभावा अप्यद्वयेनैव सतात्मना विकल्पिताः । न हि निरास्पदा काचित्कल्पनोपलभ्यते; अतः सर्वकल्पनास्पदत्वात्स्वेनात्मनाद्वयस्याव्यभिचारात्कल्पनावस्थायामप्यद्वयता शिवा । कल्पना एव त्वशिवाः । रज्जुसर्पादिवत्त्रासादिकारिण्यो हि ताः । अद्वयताभयातः सैव शिवा ॥ ३३ ॥