वैतथ्य प्रकरण - कारिका 34

नात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथञ्चन ।
न पृथङ् नापृथक्किञ्चिदिति तत्त्वविदो विदुः ॥ ३४ ॥

nātmabhāvena nānedaṃ na svenāpi kathañcana .
na pṛthaṅ nāpṛthakkiñciditi tattvavido viduḥ .. 34 ..


यह नानात्व न तो आत्मस्वरूप से है और न अपने ही स्वरूप से कुछ है । कोई भी वस्तु न तो ब्रह्म से पृथक् है और न अपृथक् ही—ऐसा तत्त्ववेत्ता जानते हैं ॥ ३४ ॥

इस अद्वितीय परमार्थ सत्य आत्मा में यह प्राणादि संसारजातरूप जगत् आत्मभाव से—परमार्थ सत्यरूप से निरूपण किये जानेपर नाना अर्थात् पृथक् वस्तु के अन्तर्भूत नहीं रहता । जिस प्रकार प्रकाशद्वारा रज्जुरूप से निरूपित होनेपर कल्पित सर्प पृथक्-रूप से नहीं रहता उसी प्रकार [परमार्थरूप से निरूपण किया जानेपर जगत् आत्मा से पृथक् वस्तु नहीं ठहरता]; और न यह, रज्जुसर्प के समान कल्पित होने के कारण ही, अपने प्राणादिस्वरूप से कभी कुछ रहता है ।

तथा जिस प्रकार घोड़े से भैंस पृथक् है उस प्रकार प्राणादि वस्तु आपस में भी पृथक् नहीं हैं । इसीलिये असद्रूप होने से आपस में अथवा किसी अन्य से कोई वस्तु अपृथक् भी नहीं है—ऐसा आत्मज्ञ ब्राह्मणलोग परमार्थतत्त्व को जानते हैं । अतः अमङ्गल की हेतुता का अभाव होने से अद्वयता ही मङ्गलमयी है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३४ ॥

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न ह्यत्राद्वये परमार्थसत्यात्मनि प्राणादिसंसारजातमिदं जगदात्मभावेन परमार्थस्वरूपेण निरूप्यमाणं नाना वस्त्वन्तरभूतं भवति । यथा रज्जुस्वरूपेण प्रकाशेन निरूप्यमाणो न नानाभूतः कल्पितः सर्पोऽस्ति तद्वत् । नापि स्वेन प्राणाद्यात्मनेदं विद्यते कदाचिदपि रज्जुसर्पवत् कल्पितत्वादेव ।

तथान्योन्यं न पृथक्प्राणादि वस्तु यथाश्वान्महिषः पृथग्विद्यत एवम् । अतोऽसत्त्वान्नापृथग्विद्यते अन्योन्यं परेण वा किञ्चिदिति एवं परमार्थतत्त्वमात्मविदो ब्राह्मणा विदुः । अतोऽशिवहेतुत्वाभावादद्वयतैव शिवेत्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥


इस रहस्य के साक्षी कौन थे?

अब इस सम्यग्ज्ञान की स्तुति की जाती है—
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तदेतत्सम्यग्दर्शनं स्तूयते—