वीतरागभयक्रोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥
निर्विकल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः ॥ ३५ ॥
vītarāgabhayakrodhairmunibhirvedapāragaiḥ .
nirvikalpo hyayaṃ dṛṣṭaḥ prapañcopaśamo’dvayaḥ .. 35 ..
जिनके राग, भय और क्रोध निवृत्त हो गये हैं उन वेद के पारगामी मुनियों द्वारा ही यह निर्विकल्प प्रपञ्चोपशम अद्वय तत्त्व देखा गया है ॥ ३५ ॥
जिनके राग, भय और क्रोधादि समस्त दोष निवृत्त हो गये हैं उन मुनियों अर्थात् सर्वदा मननशील विवेकियों और वेद के पारगामियों यानी वेदार्थ के मर्मज्ञ वेदान्तार्थपरायण तत्त्वज्ञानियों द्वारा यह सब प्रकार के विकल्पों से रहित निर्विकल्प और प्रपञ्चोपशम—द्वैतरूप भेद के विस्तार का नाम प्रपञ्च है उसकी जिसमें निवृत्ति हो जाती है वह आत्मा प्रपञ्चोपशम है—इसीलिये जो अद्वय है ऐसा यह आत्मा पण्डित यानी वेदान्तार्थ में तत्पर, दोषहीन संन्यासियों द्वारा ही देखा जा सकता है । जिनके चित्त रागादि दोष से दूषित हैं और जिनके दर्शन अपने पक्ष का आग्रह करनेवाले हैं उन अन्य तार्किकादि को इस आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३५ ॥
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विगतरागभयद्वेषक्रोधादिसर्वदोषैः सर्वदा मुनिभिर्मननशीलैर्विवेकिभिर्वेदपारगैरवगतवेदार्थतत्त्वैर्ज्ञानिभिर्निर्विकल्पः सर्वविकल्पशून्योऽयमात्मा दृष्ट उपलब्धो वेदान्तार्थतत्परैः प्रपञ्चोपशमः—प्रपञ्चो द्वैतभेदविस्तारस्तस्योपशमोऽभावो यस्मिन्स आत्मा प्रपञ्चोपशमोऽत एवाद्वयो विगतदोषैरेव पण्डितैर्वेदान्तार्थतत्परैः संन्यासिभिः परमात्मा द्रष्टुं शक्यः, नान्यै रागादिकलुषितचेतोभिः स्वपक्षपातिदर्शनैस्तार्किकादिभिरित्यभिप्रायः ॥ ३५ ॥
तत्त्वदर्शन का आदेश
क्योंकि सम्पूर्ण अनर्थों का निवृत्तिस्थान होने से अद्वयत्व ही मङ्गलमय और अभयरूप है—
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यस्मात्सर्वानर्थप्रशमरूपत्वादद्वयं शिवमभयम्—