वैतथ्य प्रकरण - कारिका 36

तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत्स्मृतिम् ।
अद्वैतं समनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ॥ ३६ ॥

tasmādevaṃ viditvainamadvaite yojayetsmṛtim .
advaitaṃ samanuprāpya jaḍavallokamācaret .. 36 ..


इसलिये इस (आत्मतत्त्व)-को ऐसा जानकर अद्वैत में मनोनिवेश करे और अद्वैततत्त्व को प्राप्तकर लोक में जडवत् व्यवहार करे ॥ ३६ ॥
इसलिये इसे ऐसा जानकर अद्वैत में मनोनिवेश करे; अर्थात् अद्वैतबोध के लिये ही चिन्तन करे और उस अद्वैत को जानकर अर्थात् ‘मैं ही परब्रह्म हूँ’ ऐसा ज्ञान प्राप्तकर, यानी सम्पूर्ण लोकव्यवहार से शून्य, भोजनेच्छा आदि से अतीत; साक्षात् अपरोक्ष अजन्मा आत्मा को अनुभवकर लोक में जडवत् आचरण करे । तात्पर्य यह है कि ‘मैं ऐसा हूँ’ इस प्रकार अपने को प्रकट न करता हुआ व्यवहार करे ॥ ३६ ॥
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अत एवं विदित्वैनमद्वैते स्मृतिं योजयेत् । अद्वैतावगमायैव स्मृतिं कुर्यादित्यर्थः । तच्चाद्वैतमवगम्याहमस्मि परं ब्रह्मेति विदित्वाशनायाद्यतीतं साक्षादपरोक्षादजमात्मानं सर्वलोकव्यवहारातीतं जडवल्लोकमाचरेत् । अप्रख्यापयन्नात्मानमहमेवंविध इत्यभिप्रायः ॥ ३६ ॥

तत्त्वदर्शी का आचरण

लोक में कैसे व्यवहार से आचरण करे? इसपर कहते हैं—
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कया चर्यया लोकमाचरेदित्याह—