वैतथ्य प्रकरण - कारिका 37

निस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥ ३७ ॥

nistutirnirnamaskāro niḥsvadhākāra eva ca .
calācalaniketaśca yatiryādṛcchiko bhavet .. 37 ..


यति को स्तुति, नमस्कार और स्वधाकार (पैत्रकर्म)-से रहित हो चल (शरीर) और अचल (आत्मा)-में ही विश्राम करनेवाला होकर यादृच्छिक (अनायासलब्ध वस्तु द्वारा सन्तुष्ट रहनेवाला) हो जाना चाहिये ॥ ३७ ॥
स्तुति-नमस्कारादि सम्पूर्ण कर्मों से रहित तथा बाह्य एषणाओं का त्यागी हो, अर्थात् “निश्चय इस उस आत्मा को जानकर” इत्यादि श्रुति और “जिनकी बुद्धि, आत्मा और निष्ठा उसी में लगी हुई हैं तथा जो उसी के शरणापन्न हैं” इस स्मृति के अनुसार परमहंस पारिव्राज्य भाव को प्राप्त हो—प्रतिक्षण अन्यथा भाव को प्राप्त होनेवाला होने से ‘चल’ शरीर को कहते हैं तथा ‘अचल’ आत्मतत्त्व का नाम है—इस प्रकार जब-तब भोजनादि व्यवहार के निमित्त से आकाश के समान अविचल अपने स्वरूपभूत आत्मतत्त्व को जो अपना निकेत यानी आश्रय है उसे अर्थात् आत्मस्थिति को भूलकर जब ‘मैं हूँ’ इस प्रकार अभिमान करता है, उस समय ‘चल’ यानी शरीर ही जिसका निकेत है—इस प्रकार विद्वान् चलाचलनिकेत होकर अर्थात् फिर बाह्य विषयों का आश्रय न करके यादृच्छिक हो जाय; तात्पर्य यह कि अनायास ही प्राप्त हुए कौपीन, आच्छादन और ग्रासमात्र से जिसकी देहस्थिति है—ऐसा हो जाय ॥ ३७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्तुतिनमस्कारादिसर्वकर्मवर्जितस्त्यक्तसर्वबाह्यैषणः प्रतिपन्नपरमहंसपारिव्राज्य इत्यभिप्रायः—

“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” (बृ० उ० ३ । ५ । १) इत्यादिश्रुतेः; “तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः” (गीता ५ । १७) इत्यादिस्मृतेश्च—चलं शरीरं प्रतिक्षणमन्यथाभावात्, अचलमात्मतत्त्वम्, यदाकदाचिद्भोजनादिव्यवहारनिमित्तमाकाशवदचलं स्वरूपमात्मतत्त्वमात्मनो निकेतमाश्रयमात्मस्थितिं विस्मृत्याहमिति मन्यते यदा तदा चलो देहो निकेतो यस्य सोऽयमेवं चलाचलनिकेतो विद्वान्न पुनर्बाह्यविषयाश्रयः; स च यादृच्छिको भवेत् । यदृच्छाप्राप्तकौपीनाच्छादनग्रासमात्रदेहस्थितिरित्यर्थः ॥ ३७ ॥