तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वा तु बाह्यतः ।
तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥ ३८ ॥
तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ॥ ३८ ॥
tattvamādhyātmikaṃ dṛṣṭvā tattvaṃ dṛṣṭvā tu bāhyataḥ .
tattvībhūtastadārāmastattvādapracyuto bhavet .. 38 ..
[फिर वह विवेकी पुरुष] आध्यात्मिक तत्त्व को देखकर और बाह्य तत्त्व का भी अनुभव कर, तत्त्वीभूत और तत्त्व में ही रमण करनेवाला होकर तत्त्व से च्युत न हो ॥ ३८ ॥
पृथिवी आदि बाह्य तत्त्व और देहादिरूप आध्यात्मिक तत्त्व “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” इत्यादि श्रुति के अनुसार रज्जुसर्पादि के समान एवं स्वप्न या माया के समान मिथ्या हैं; तथा “वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है” इस श्रुति के अनुसार आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, कारणरहित, कार्यरहित, अन्तर्बाह्यशून्य, परिपूर्ण, आकाश के समान सर्वगत, सूक्ष्म, अचल, निर्गुण, निष्कल और निष्क्रिय है । इस प्रकार तत्त्व का साक्षात्कार कर तत्त्वीभूत और उसी में रमण करनेवाला होकर अर्थात् बाह्यरत न होकर; जिस प्रकार मन को ही आत्मा माननेवाला कोई अतत्त्वदर्शी पुरुष किसी समय चित्त के चञ्चल होने पर आत्मा को भी चलायमान मानकर अपने को तत्त्व से विचलित और देहादिरूप समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्व से च्युत हो गया हूँ तथा किसी समय चित्त के समाहित होने पर अपने को तत्त्वीभूत और प्रसन्न समझकर मानता है कि इस समय मैं तत्त्वस्थ हूँ उसी प्रकार आत्मवेत्ता को न हो जाना चाहिये; क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप है और उसका स्वरूप से च्युत होना भी सम्भव नहीं है । अतः वह सदा ही “मैं ब्रह्म हूँ” ऐसा निश्चयकर तत्त्व से च्युत न हो; तात्पर्य यह कि सदा ही अच्युत आत्मदर्शी हो, जैसा कि “कुत्ते और चाण्डाल में भी विद्वानों की समान दृष्टि होती है” तथा “सम्पूर्ण भूतों में समान भाव से स्थित” आदि स्मृतियों से प्रमाणित होता है ॥ ३८ ॥
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बाह्यं पृथिव्यादितत्त्वम् आध्यात्मिकं च देहादिलक्षणं रज्जुसर्पादिवत्स्वप्नमायादिवच्च असत् “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इत्यादिश्रुतेः । आत्मा च सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजोऽपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्न आकाशवत्सर्वगतः सूक्ष्मोऽचलो निर्गुणो निष्कलो निष्क्रियः “तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८ । १६) इति श्रुतेः । इत्येवं तत्त्वं दृष्ट्वा तत्त्वीभूतस्तदारामो न बाह्यरमणो यथातत्त्वदर्शी कश्चिच्चित्तमात्मत्वेन प्रतिपन्नश्चित्तचलनमनु चलितमात्मानं मन्यमानस्तत्त्वाच्चलितं देहादिभूतमात्मानं कदाचिन्मन्यते प्रच्युतोऽहमात्मतत्त्वादिदानीमिति; समाहिते तु मनसि कदाचित्तत्त्वभूतं प्रसन्नात्मानं मन्यत इदानीमस्मि तत्त्वीभूत इति; न तथात्मविद्भवेत् । आत्मन एकरूपत्वात् स्वरूपप्रच्यवनासम्भवाच्च । सदैव ब्रह्मास्मीत्यप्रच्युतो भवेत्- तत्त्वात्सदाप्रच्युतात्मतत्त्वदर्शनो भवेदित्यभिप्रायः “शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता ५ । १८) “समं सर्वेषु भूतेषु” (गीता १३ । २७) इत्यादिस्मृतेः ॥ ३८ ॥
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्ये वैतथ्याख्यं द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
अद्वैतप्रकरण
[आगमप्रकरण में] ओङ्कार का निर्णय करते समय यह बात केवल प्रतिज्ञामात्र से कही है कि आत्मा प्रपञ्च का निवृत्तिस्थान शिव और अद्वैतस्वरूप है तथा ज्ञान हो जाने पर द्वैत नहीं रहता । फिर वैतथ्यप्रकरण में स्वप्न, माया और गन्धर्वनगरादि के दृष्टान्तों से दृश्यत्व एवं आदि-अन्तवत्त्व आदि हेतुओं द्वारा तर्क से भी द्वैत के अभाव का प्रतिपादन किया गया । किन्तु वह अद्वैत क्या शास्त्रमात्र से ही ज्ञातव्य है अथवा तर्क से भी जाना जा सकता है? इस पर कहते हैं—तर्क से भी जाना जा सकता है । सो किस प्रकार? इसी बात को बतलाने के लिये अद्वैतप्रकरण का आरम्भ किया जाता है । उपास्य और उपासना आदि सम्पूर्ण भेद मिथ्या है, केवल आत्मा ही अद्वय परमार्थस्वरूप है—यह बात पिछले प्रकरण में निश्चित हुई है; क्योंकि—
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ओङ्कारनिर्णय उक्तः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत आत्मेति प्रतिज्ञामात्रेण । ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इति च । तत्र द्वैताभावस्तु वैतथ्यप्रकरणेन स्वप्नमायागन्धर्वनगरादिदृष्टान्तैर्दृश्यत्वाद्यन्तवत्त्वादिहेतुभिस्तर्केण च प्रतिपादितः । अद्वैतं किमागममात्रेण प्रतिपत्तव्यमाहोस्वित्तर्केणापीत्यत आह—शक्यते तर्केणापि ज्ञातुम्; तत्कथमित्यद्वैतप्रकरणमारभ्यते । उपास्योपासनादिभेदजातं सर्वं वितथं केवलश्चात्माद्वयः परमार्थ इति स्थितमतीते प्रकरणे; यतः—