अन्तःस्थानात्तु भेदानां तस्माज्जागरिते स्मृतम् ।
यथा तत्र तथा स्वप्ने संवृतत्वेन भिद्यते ॥ ४ ॥
यथा तत्र तथा स्वप्ने संवृतत्वेन भिद्यते ॥ ४ ॥
antaḥsthānāttu bhedānāṃ tasmājjāgarite smṛtam .
yathā tatra tathā svapne saṃvṛtatvena bhidyate .. 4 ..
इसीसे जाग्रत्-अवस्था में भी पदार्थों का मिथ्यात्व है, क्योंकि जिस प्रकार वे वहाँ स्वप्नावस्था में [मिथ्या] होते हैं उसी प्रकार जाग्रत् में भी होते हैं । केवल शरीर के भीतर स्थित होने और स्थान के संकुचित होने में ही स्वप्नदृष्ट पदार्थों का भेद है ॥ ४ ॥
जाग्रत्-अवस्था में देखे हुए पदार्थ मिथ्या हैं—यह प्रतिज्ञा है । दृश्य होने के कारण—यह उसका हेतु है । स्वप्न में देखे हुए पदार्थों के समान—यह दृष्टान्त है । जिस प्रकार वहाँ स्वप्न में देखे हुए पदार्थों का मिथ्यात्व है उसी प्रकार जाग्रत् में भी उनका दृश्यत्व समानरूप से है—यह हेतूपनय[ १ ] है । अतः जागृति में भी उनका मिथ्यात्व माना गया है—यह निगमन है । अन्तःस्थ होने और स्थान का संकोच होने में स्वप्नदृष्ट भावों का जाग्रद्दृष्ट भावों से भेद है । दृश्यत्व और असत्यत्व तो दोनों ही अवस्थाओं में समान हैं ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
जाग्रद्दृश्यानां भावानां वैतथ्यस्वप्नपदार्थवद्- मिति प्रतिज्ञा । दृश्यत्वेन दृश्यत्वादिति हेतुः । मिथ्यात्वम् स्वप्नदृश्यभाववदिति दृष्टान्तः । यथा तत्र स्वप्ने दृश्यानां भावानां वैतथ्यं तथा जागरितेऽपि दृश्यत्वमविशिष्टमिति हेतूपनयः । तस्माज्जागरितेऽपि वैतथ्यं स्मृतमिति निगमनम् । अन्तःस्थानात्संवृतत्वेन च स्वप्नदृश्यानां भावानां जाग्रद्दृश्येभ्यो भेदः । दृश्यत्वमसत्यत्वं चाविशिष्टमुभयत्र ॥ ४ ॥