स्वप्नजागरितस्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिणः ।
भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना ॥ ५ ॥
भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना ॥ ५ ॥
svapnajāgaritasthāne hyekamāhurmanīṣiṇaḥ .
bhedānāṃ hi samatvena prasiddhenaiva hetunā .. 5 ..
इस प्रकार प्रसिद्ध हेतु से ही पदार्थों में समानता होने के कारण विवेकी पुरुषों ने स्वप्न और जागरित-अवस्थाओं को एक ही बतलाया है ॥ ५ ॥
पदार्थों के ग्राह्यग्राहकत्वरूप प्रसिद्ध हेतु से समानता होने के कारण ही विवेकी पुरुषों ने स्वप्न और जागरित-अवस्थाओं का एकत्व प्रतिपादन किया है—
इस प्रकार यह पूर्व प्रमाण से सिद्ध हुए हेतु का ही फल है ॥ ५ ॥
[ १ ]: व्याप्तिविशिष्ट हेतु पक्ष में है—ऐसा प्रतिपादन करना ‘हेतूपनय’ कहलाता है ।
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प्रसिद्धेनैव भेदानां ग्राह्यग्राह्यग्राहक- ग्राहकत्वेन हेतुना त्वात् समत्वेन स्वप्नजागरितस्थानयोरेकत्वमाहुर्विवेकिन इति पूर्वप्रमाणसिद्धस्यैव फलम् ॥ ५ ॥
जाग्रत्-अवस्था में दिखलायी देनेवाले पदार्थों का मिथ्यात्व इसलिये भी है, क्योंकि आदि और अन्त में उनका अभाव है ।
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इतश्च वैतथ्यं जाग्रद्दृश्यानां भेदानामाद्यन्तयोरभावात् ।