वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ६ ॥
ādāvante ca yannāsti vartamāne’pi tattathā .
vitathaiḥ sadṛśāḥ santo’vitathā iva lakṣitāḥ .. 6 ..
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शङ्का—स्वप्नदृश्यों के समान जागरितअवस्था के दृश्यों का भी जो असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक नहीं; क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान और वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास की निवृत्ति तथा गमनागमन आदि कार्यों के करने के कारण प्रयोजनवाले देखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्यों के विषय में ऐसी बात नहीं है । अतः स्वप्नदृश्यों के समान जाग्रद्दृश्यों की असत्यता केवल मनोरथमात्र है ।
समाधान—ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि—
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स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्यानामप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् । यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाहनादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिं कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं च सप्रयोजना दृष्टाः । न तु स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्नदृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वं मनोरथमात्रमिति ।
तन्न । कस्मात्? यस्मात्—