वैतथ्य प्रकरण - कारिका 6

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ६ ॥

ādāvante ca yannāsti vartamāne’pi tattathā .
vitathaiḥ sadṛśāḥ santo’vitathā iva lakṣitāḥ .. 6 ..


जो आदि और अन्त में नहीं है [अर्थात् आदि और अन्त में असद्रूप है] वह वर्तमान में भी वैसा ही है । ये पदार्थसमूह असत् के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥
जो मृगतृष्णादि वस्तु आदि और अन्त में नहीं है वह मध्य में भी नहीं होती— यह बात लोक में निश्चित ही है । इसी प्रकार ये जाग्रत्-अवस्था में दिखलायी देनेवाले भिन्न-भिन्न पदार्थ भी आदि और अन्त में न होने से मृगतृष्णा आदि असद्वस्तुओं के समान होने के कारण असत् ही हैं; तथापि मूढ अनात्मज्ञ पुरुषों द्वारा वे सद्रूप समझे जाते हैं ॥ ६ ॥
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यदादावन्ते च नास्ति वस्तु आदावन्ते मृगतृष्णिकादि चाभावात् तन्मध्येऽपि नास्तीति निश्चितं लोके तथेमे जाग्रद्दृश्या भेदाः । आद्यन्तयोरभावाद्वितथैरेव मृगतृष्णिकादिभिः सदृशत्वाद्वितथा एव तथाप्यवितथा इव लक्षिता मूढैरनात्मविद्भिः ॥ ६ ॥

शङ्का—स्वप्नदृश्यों के समान जागरितअवस्था के दृश्यों का भी जो असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक नहीं; क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान और वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास की निवृत्ति तथा गमनागमन आदि कार्यों के करने के कारण प्रयोजनवाले देखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्यों के विषय में ऐसी बात नहीं है । अतः स्वप्नदृश्यों के समान जाग्रद्दृश्यों की असत्यता केवल मनोरथमात्र है ।

समाधान—ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं है? क्योंकि—

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स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्यानामप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् । यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाहनादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिं कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं च सप्रयोजना दृष्टाः । न तु स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्नदृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वं मनोरथमात्रमिति ।

तन्न । कस्मात्? यस्मात्—