वैतथ्य प्रकरण - कारिका 7

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥

saprayojanatā teṣāṃ svapne vipratipadyate .
tasmādādyantavattvena mithyaiva khalu te smṛtāḥ .. 7 ..


स्वप्न में उन (जाग्रत्-पदार्थों)-की सप्रयोजनता में विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्तयुक्त होने के कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥
[जागरित-अवस्था में] जो अन्नपानादि की सप्रयोजनता देखी गयी है वह स्वप्न में नहीं रहती । जागरितअवस्था में खा-पीकर तृप्त हुआ पुरुष तृषारहित होकर सोने पर भी [स्वप्न में] अपने को क्षुधा-पिपासा आदि से आर्त्त, दिन-रात उपवास किया हुआ और बिना भोजन किया हुआ मानता है; जिस प्रकार कि स्वप्न में, खा-पीकर जागा हुआ पुरुष अपने को अतृप्त अनुभव करता है । अतः स्वप्नावस्था में जाग्रद्दृश्यों की विपरीतता देखी जाती है । इसलिये स्वप्नदृश्यों के समान उनकी असत्यता को भी हम शङ्का न करनेयोग्य मानते हैं । इस प्रकार दोनों ही अवस्थाओं में आदि-अन्तवत्त्व समान है; अतः वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सप्रयोजनता दृष्टा यान्नपानादीनां स्वप्ने विप्रतिपद्यते । जागरिते हि भुक्त्वा पीत्वा च तृप्तो विनिवर्तिततृट्सुप्तमात्र एव क्षुत्पिपासाद्यार्तमहोरात्रोषितमभुक्तवन्तमात्मानं मन्यते । यथा स्वप्ने भुक्त्वा पीत्वा चातृप्तोत्थितस्तथा । तस्माज्जाग्रद्दृश्यानां स्वप्ने विप्रतिपत्तिर्दृष्टा । अतो मन्यामहे तेषामप्यसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदनाशङ्कनीयमिति । तस्मा- दाद्यन्तवत्त्वमुभयत्र समानमिति मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥

स्वप्न और जाग्रत्पदार्थों के समान होने से जाग्रत्पदार्थों की जो असत्यता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है । क्यों? क्योंकि यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता? कैसे सिद्ध नहीं हो सकता? क्योंकि जो पदार्थ जाग्रत्-अवस्था में देखे जाते हैं वे ही स्वप्न में नहीं देखे जाते । तो उस समय और क्या देखा जाता है?

स्वप्न में तो यह अपूर्व वस्तुएँ देखता है । अपने को चार दाँतोंवाले हाथी पर चढ़ा हुआ तथा आठ भुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार स्वप्न में और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा करता है । वे किसी अन्य असत् वस्तु के समान नहीं होतीं; इसलिये वे सत् ही हैं । अतः यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता । अतः स्वप्न के समान जागरित की भी असत्यता है—यह कथन ठीक नहीं ।

ऐसी बात नहीं है । स्वप्न में देखी हुई जिन वस्तुओं को अपूर्व समझता है वे स्वतः सिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं?

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्वप्नजाग्रद्भेदयोः समत्वाज्जाग्रद्भेदानामसत्त्वमिति यदुक्तं तदसत्, कस्मात्? दृष्टान्तस्यासिद्धत्वात्? कथम् । न हि जाग्रद्दृष्टा एवैते भेदाः स्वप्ने दृश्यन्ते । किं तर्हि?

अपूर्वं स्वप्ने पश्यति; चतुर्दन्तगजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते । अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्वं पश्यति स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममिति सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः । तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वमित्ययुक्तम् ।

तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्वं यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् । किं तर्हि?