तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥
saprayojanatā teṣāṃ svapne vipratipadyate .
tasmādādyantavattvena mithyaiva khalu te smṛtāḥ .. 7 ..
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स्वप्न और जाग्रत्पदार्थों के समान होने से जाग्रत्पदार्थों की जो असत्यता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है । क्यों? क्योंकि यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता? कैसे सिद्ध नहीं हो सकता? क्योंकि जो पदार्थ जाग्रत्-अवस्था में देखे जाते हैं वे ही स्वप्न में नहीं देखे जाते । तो उस समय और क्या देखा जाता है?
स्वप्न में तो यह अपूर्व वस्तुएँ देखता है । अपने को चार दाँतोंवाले हाथी पर चढ़ा हुआ तथा आठ भुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार स्वप्न में और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा करता है । वे किसी अन्य असत् वस्तु के समान नहीं होतीं; इसलिये वे सत् ही हैं । अतः यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता । अतः स्वप्न के समान जागरित की भी असत्यता है—यह कथन ठीक नहीं ।
ऐसी बात नहीं है । स्वप्न में देखी हुई जिन वस्तुओं को अपूर्व समझता है वे स्वतः सिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं?
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स्वप्नजाग्रद्भेदयोः समत्वाज्जाग्रद्भेदानामसत्त्वमिति यदुक्तं तदसत्, कस्मात्? दृष्टान्तस्यासिद्धत्वात्? कथम् । न हि जाग्रद्दृष्टा एवैते भेदाः स्वप्ने दृश्यन्ते । किं तर्हि?
अपूर्वं स्वप्ने पश्यति; चतुर्दन्तगजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते । अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्वं पश्यति स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममिति सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः । तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वमित्ययुक्तम् ।
तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्वं यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् । किं तर्हि?