वैतथ्य प्रकरण - कारिका 8

अपूर्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।
तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥ ८ ॥

apūrvaṃ sthānidharmo hi yathā svarganivāsinām .
tānayaṃ prekṣate gatvā yathaiveha suśikṣitaḥ .. 8 ..


जिस प्रकार [इन्द्रादि] स्वर्गनिवासियों की [सहस्रनेत्रत्वादि] अलौकिक अवस्थाएँ सुनी जाती हैं उसी प्रकार यह (स्वप्न) भी स्थानी (स्वप्नद्रष्टा आत्मा)-का अपूर्व धर्म है । उन स्वाप्न पदार्थों को यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोक में [किसी मार्गविशेष के सम्बन्ध में] सुशिक्षित पुरुष [उस मार्ग से जाकर अपने अभीष्ट लक्ष्य पर पहुँचकर उसे देखता है] ॥ ८ ॥
वे स्थानी का अपूर्व धर्म ही हैं; स्थानी अर्थात् स्वप्नस्थानवाले द्रष्टा का ही धर्म हैं । जैसे कि स्वर्गनिवासी इन्द्रादि के सहस्राक्षत्वादि धर्म हैं उसी प्रकार स्वप्नद्रष्टा का यह अपूर्व धर्म है । द्रष्टा के स्वरूप के समान यह स्वतःसिद्ध नहीं है । इस प्रकार के अपने चित्तद्वारा कल्पना किये हुए उन धर्मों को यह जो स्वप्न देखनेवाला स्थानी है स्वप्नस्थान में जाकर देखा करता है; जिस प्रकार इस लोक में देशान्तर के मार्ग के विषय में सुशिक्षित पुरुष उस मार्ग से देशान्तर में जाकर वहाँ के पदार्थों को देखता है उसी प्रकार [यह भी देखता है] । अतः जिस प्रकार स्थानी के धर्म रज्जु-सर्प और मृगतृष्णा आदि की असत्यता है उसी प्रकार स्वप्न में देखे जानेवाले अपूर्व पदार्थों का भी स्थानिधर्मत्व ही है, अतः वे भी असत् हैं । इसलिये स्वप्नदृष्टान्त की असिद्धता नहीं है ॥ ८ ॥
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अपूर्वं स्थानिधर्मो हि स्थानिनो द्रष्टुरेव हि स्वप्नस्थानवतो धर्मः । यथा स्वर्गनिवासिनामिन्द्रादीनां सहस्राक्षत्वादि तथा स्वप्नदृशोऽपूर्वोऽयं धर्मः । न स्वतः सिद्धो द्रष्टुः स्वरूपवत् । तानेवंप्रकारानपूर्वान्स्वचित्तविकल्पानयं स्थानी स्वप्नदृक्स्वप्नस्थानं गत्वा प्रेक्षते । यथैवेह लोके सुशिक्षितो देशान्तरमार्गस्तेन मार्गेण देशान्तरं गत्वा तान्पदार्थान्पश्यति तद्वत् । तस्माद्यथा स्थानिधर्माणां रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादीनामसत्त्वं तथा स्वप्नदृश्यानामपूर्वाणां स्थानिधर्मत्वमेवेत्यसत्त्वमतो न स्वप्नदृष्टान्तस्यासिद्धत्वम् ॥ ८ ॥

स्वप्न में मनःकल्पित और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं

स्वप्नदृष्टान्त के अपूर्वत्व की आशङ्का का निराकरण कर दिया । अब पुनः जाग्रत्पदार्थों की स्वप्नतुल्यता का विस्तृतरूप से प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
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अपूर्वत्वाशङ्का निराकृता स्वप्नदृष्टान्तस्य पुनः जाग्रद्भेदानां स्वप्नतुल्यतां प्रपञ्चयन्नाह—