वैतथ्य प्रकरण - कारिका 9

स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।
बहिश्चेतोगृहीतं सद्दृष्टं वैतथ्यमेतयोः ॥ ९ ॥

svapnavṛttāvapi tvantaścetasā kalpitaṃ tvasat .
bahiścetogṛhītaṃ saddṛṣṭaṃ vaitathyametayoḥ .. 9 ..


स्वप्नावस्था में भी चित्त के भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् और चित्त से बाहर [इन्द्रियोंद्वारा] ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् जान पड़ता है; किन्तु इन दोनों का ही मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥
स्वप्न की वृत्ति अर्थात् स्वप्नस्थान में भी चित्त के भीतर मनोरथ से सङ्कल्प की हुई वस्तु असत् होती है; क्योंकि वह सङ्कल्प के पश्चात् तत्क्षण ही दिखायी नहीं देती । तथा उस स्वप्नावस्था में ही चित्त से बाहर चक्षु आदिद्वारा ग्रहण किये हुए घट आदि सत् होते हैं । इस प्रकार स्वप्न असत्य है—ऐसा निश्चय हो जाने पर भी उसमें सत्-असत् का विभाग देखा जाता है । किन्तु चित्त से कल्पना किये हुए इन आन्तरिक और बाह्य दोनों ही प्रकार के पदार्थों का मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वप्नवृत्तावपि स्वप्नस्थानेऽपि अन्तश्चेतसा मनोरथसङ्कल्पितमसत् । सङ्कल्पानन्तरसमकालमेवादर्शनात्तत्रैव स्वप्ने बहिश्चेतसा गृहीतं चक्षुरादिद्वारेणोपलब्धं घटादि सत् । इत्येवमसत्यमिति निश्चितेऽपि सदसद्विभागो दृष्टः । उभयोरप्यन्तर्बहिश्चेतःकल्पितयोर्वैतथ्यमेव दृष्टम् ॥ ९ ॥