उपासनाश्रितो धर्मो जाते ब्रह्मणि वर्तते ।
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥
प्रागुत्पत्तेरजं सर्वं तेनासौ कृपणः स्मृतः ॥ १ ॥
upāsanāśrito dharmo jāte brahmaṇi vartate .
prāgutpatterajaṃ sarvaṃ tenāsau kṛpaṇaḥ smṛtaḥ .. 1 ..
उपासना का आश्रय लेनेवाला जीव कार्यब्रह्म में ही रहता है [अर्थात् उसे ही अपना उपास्य मानता है और समझता है कि] उत्पत्ति के पूर्व ही सब अज [अर्थात् अजन्मा ब्रह्मस्वरूप] था । इसलिये वह कृपण (दीन) माना गया है ॥ १ ॥
‘उपासनाश्रितः’—उपासना को अपने मोक्ष के साधनरूप से माननेवाला पुरुष अर्थात् ‘मैं उपासक हूँ और ब्रह्म मेरा उपास्य है । उसकी उपासना करके इस समय कार्यब्रह्म में रहता हुआ शरीरपात के अनन्तर मैं अजन्मा ब्रह्म को प्राप्त हो जाऊँगा तथा उत्पत्ति के पूर्व भी यह सब और मैं अजरूप ही थे । उत्पत्ति से पूर्व मैं जैसा था अब उत्पन्न होकर जातब्रह्म में वर्तमान हुआ अन्त में उपासना द्वारा मैं फिर उसी रूप को प्राप्त हो जाऊँगा’—इस प्रकार उपासना का आश्रय लेनेवाला साधक जीव क्योंकि क्षुद्रब्रह्मवेत्ता है, इस कारण से ही यह सर्वदा अजन्मा ब्रह्म का दर्शन करनेवाले महात्माओं द्वारा कृपण—दीन अर्थात् क्षुद्र माना गया है—यह इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जो वाणी से प्रकट नहीं होता बल्कि जिससे वाणी प्रकट होती है, वही ब्रह्म है—ऐसा जान; जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है” इत्यादि तलवकारश्रुति से प्रमाणित होता है ॥ १ ॥
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उपासनाश्रित उपासनामात्मनो मोक्षसाधनत्वेन गत उपासकोऽहं ममोपास्यं ब्रह्म । तदुपासनं कृत्वा जाते ब्रह्मणीदानीं वर्तमानोऽजं ब्रह्म शरीरपातादूर्ध्वं प्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजमिदं सर्वमहं च । यदात्मकोऽहं प्रागुत्पत्तेरिदानीं जातो जाते ब्रह्मणि च वर्तमान उपासनया पुनस्तदेव प्रतिपत्स्य इत्येवमुपासनाश्रितो धर्मः साधको येनैवं क्षुद्रब्रह्मवित्तेनासौ कारणेन कृपणो दीनोऽल्पकः स्मृतो नित्याजब्रह्मदर्शिभिरित्यभिप्रायः । “यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १ ।४) इत्यादिश्रुतेस्तलवकाराणाम् ॥ १ ॥
अकार्पण्यनिरूपण की प्रतिज्ञा
बाहर और भीतर वर्तमान अजन्मा आत्मा को प्राप्त करने में असमर्थ होने के कारण अविद्यावश अपने को दीन माननेवाला पुरुष, क्योंकि ‘मैं उत्पन्न हुआ हूँ, उत्पन्न हुए ब्रह्म में ही वर्तमान हूँ और उसकी उपासना का आश्रय लेकर ही ब्रह्म को प्राप्त होऊँगा, इस प्रकार मानने के कारण दीन है—
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सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मानं प्रतिपत्तुमशक्नुवन्नविद्यया दीनमात्मानं मन्यमानो जातोऽहं जाते ब्रह्मणि वर्ते तदुपासनाश्रितः सन्ब्रह्म प्रतिपत्स्य इत्येवं प्रतिपन्नः कृपणो भवति यस्मात्—