अद्वैत प्रकरण - कारिका 10

संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥

saṃghātāḥ svapnavatsarve ātmamāyāvisarjitāḥ .
ādhikye sarvasāmye vā nopapattirhi vidyate .. 10 ..


देहादि समस्त संघात स्वप्न के समान आत्मा की माया से ही रचे हुए हैं । उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानता में भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥
घटादिस्थानीय देहादिसंघात स्वप्न में दीखनेवाले देहादि के समान तथा मायावी के रचे हुए देहादि के सदृश आत्मा की माया से ही रचे हुए हैं । तात्पर्य यह है कि आत्मा की माया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं । यदि तिर्यगादि देहों की अपेक्षा देवता आदि के शरीर और इन्द्रियों की अधिकता—उत्कृष्टता है अथवा यदि [तत्त्वदृष्टि से] सबकी समानता ही है, तो भी, क्योंकि उनके सद्भाव का प्रतिपादक कोई हेतु नहीं है, इसलिये वे अविद्याकृत ही हैं, परमार्थतः नहीं हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १० ॥
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घटादिस्थानीयास्तु देहादिसंघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मायाविकृतदेहादि- वच्चात्ममायाविसर्जिताः; आत्मनो मायाविद्या तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतः सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिकभावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादिकार्यकरणसंघातानां यदि वा सर्वेषां समतैव नैषामुपपत्तिः सम्भवः सद्भावप्रतिपादको हेतुर्विद्यते नास्ति, हि यस्मात्तस्मादविद्याकृता एव न परमार्थतः सन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥

उत्पत्ति आदि से रहित अद्वितीय आत्मतत्त्व का श्रुतिप्रमाणकत्व प्रदर्शित करने के लिये [उपनिषद् के] वाक्यों का उल्लेख किया जाता है—
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उत्पत्त्यादिवर्जितस्याद्वयस्यात्मतत्त्वस्य श्रुतिप्रमाणकत्वप्रदर्शनार्थं वाक्यान्युपन्यस्यन्ते—