अद्वैत प्रकरण - कारिका 11

रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ११ ॥

rasādayo hi ye kośā vyākhyātāstaittirīyake .
teṣāmātmā paro jīvaḥ khaṃ yathā saṃprakāśitaḥ .. 11 ..


तैत्तिरीय श्रुति में जिन रसादि [अन्नमयादि] कोशों की व्याख्या की गयी है, आकाशवत् परमात्मा ही उनके आत्मा जीवरूप से प्रकाशित किया गया है ॥ ११ ॥

तैत्तिरीयक में अर्थात् तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्ली में जिन रसादि—अन्नरसमय एवं प्राणमय इत्यादि कोशों की व्याख्या—स्पष्ट विवेचना की गयी है और जो उत्तरोत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व बहिःस्थित होने के कारण खड्ग के कोश के समान कोश कहे गये हैं उन कोशों का आत्मा, जिस अन्तरतम आत्मा के कारण पाँचों कोश आत्मवान् हैं, वही सबके जीवन का निमित्त होने के कारण ‘जीव’ कहलाता है ।

वह कौन है? इस पर कहते हैं—वह परमात्मा ही है, जिसका पहले “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यों में प्रसङ्ग है और जिस आत्मा से स्वप्न और माया आदि के समान आकाशादि क्रम से कोशरूप संघात आत्मा की माया से ही रचे गये हैं—ऐसा कहा गया है । उस आत्मा को हमने “आत्मा ह्याकाशवत्” इत्यादि श्लोकों में, जैसा आकाश है उसी के समान प्रकाशित किया है । तात्पर्य यह है कि वह तार्किकों के कल्पना किये हुए आत्मा के समान मनुष्य की बुद्धि से प्रमाणित होनेवाला नहीं है ॥ ११ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

रसादयोऽन्नरसमयः प्राणमय इत्येवमादयः कोशा इव कोशा अस्यादेरिवोत्तरोत्तरस्यापेक्षया बहिर्भावात्पूर्वपूर्वस्य व्याख्याता विस्पष्टमाख्यातास्तैत्तिरीयके तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्ल्यां तेषां कोशानामात्मा येनात्मना पञ्चापि कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन, स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः ।

कोऽसावित्याह—पर एवात्मा यः पूर्वं “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २ ।१) इति प्रकृतः । यस्मादात्मनः स्वप्नमायादिवदाकाशादिक्रमेण रसादयः कोशलक्षणाः संघाता आत्ममायाविसर्जिता इत्युक्तम् । स आत्मास्माभिर्यथा खं तथेति संप्रकाशित “आत्मा ह्याकाशवत्” (अद्वैत० ३) इत्यादिश्लोकैः । न तार्किकपरिकल्पितात्मवत्पुरुषबुद्धिप्रमाणगम्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥