अद्वैत प्रकरण - कारिका 12

द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाकाशः प्रकाशितः ॥ १२ ॥

dvayordvayormadhujñāne paraṃ brahma prakāśitam .
pṛthivyāmudare caiva yathākāśaḥ prakāśitaḥ .. 12 ..


लोक में जिस प्रकार पृथिवी और उदर में एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार [बृहदारण्यकोक्त] मधु ब्राह्मण में [अध्यात्म और अधिदैवत—इन] दोनों स्थानों में एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ॥ १२ ॥
तथा अधिदैवत और अध्यात्मभेद से जो तेजोमय और अमृतमय पुरुष पृथिवी के भीतर है और जो विज्ञाता परमात्मा ब्रह्म ही सब कुछ है—इस प्रकार द्वैत का क्षय होनेपर्यन्त दोनों स्थानों में परब्रह्म का ही प्रतिपादन किया गया है । कहाँ किया गया है? सो बतलाते हैं—जिसमें ब्रह्मविद्यासंज्ञक मधु यानी अमृत का ज्ञान है—आनन्द का हेतु होने के कारण उसका अमृतत्व है—उस मधुज्ञान यानी मधुब्राह्मण में [उसका प्रतिपादन किया गया है] । किसके समान प्रतिपादन किया है? इसपर कहते हैं कि जिस प्रकार लोक में अनुमान से पृथिवी और उदर में एक ही आकाश प्रकाशित होता है, उसी तरह [इनकी एकता समझो] यह इसका अभिप्राय है ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं चाधिदैवमध्यात्मं च तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः पृथिव्याद्यन्तर्गतो यो विज्ञाता पर एवात्मा ब्रह्म सर्वमिति द्वयोर्द्वयोराद्वैतक्षयात्परं ब्रह्म प्रकाशितम् । क्वेत्याह—ब्रह्मविद्याख्यं मध्वमृतममृतत्वं मोदनहेतुत्वाद्धिज्ञायते यस्मिन्निति मधुज्ञानं मधुब्राह्मणं तस्मिन्नित्यर्थः । किमिवेत्याह—पृथिव्यामुदरे चैव यथैक आकाशोऽनुमानेन प्रकाशितो लोके तद्वदित्यर्थः ॥ १२ ॥