अद्वैत प्रकरण - कारिका 13

जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते ।
नानात्वं निन्द्यते यच्च तदेवं हि समञ्जसम् ॥ १३ ॥

jīvātmanorananyatvamabhedena praśasyate .
nānātvaṃ nindyate yacca tadevaṃ hi samañjasam .. 13 ..


क्योंकि जीव और आत्मा के अभेदरूप से एकत्व की प्रशंसा की गयी है और उनके नानात्व की निन्दा की गयी है, इसलिये वही [यानी उनकी एकता ही] ठीक है ॥ १३ ॥
क्योंकि युक्ति और श्रुति से निश्चय किये हुए जीव और परमात्मा के एकत्व की शास्त्र और व्यासादि मुनियों ने समानरूप से प्रशंसा यानी स्तुति की है और शास्त्रबाह्य कुतार्किकों द्वारा कल्पित सर्वप्राणिसाधारण स्वाभाविक नानात्वदर्शन की “उससे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है” “दूसरे से निश्चय भय होता है” “जो थोड़ा-सा भी भेद करता है, उसे भय प्राप्त होता है” “यह जो कुछ है सब आत्मा है” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है” इत्यादि वाक्यों तथा अन्य ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा निन्दा की गयी है । यह जो [बतलाया गया] है वह इसी प्रकार समञ्जस—सरल बोधगम्य अर्थात् न्याययुक्त है तथा तार्किकों की कल्पना की हुई जो कुदृष्टियाँ हैं वे सरल नहीं हैं; अभिप्राय यह है कि वे निरूपण की जाने पर प्रसंग के अनुरूप नहीं ठहरतीं ॥ १३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यद्युक्तितः श्रुतितश्च निर्धारितं जीवस्य परस्य चात्मनो जीवात्मनो रनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते स्तूयते शास्त्रेण व्यासादिभिश्च । यच्च सर्वप्राणिसाधारणं स्वाभाविकं शास्त्रबहिष्कृतैः कुतार्किकैर्विरचितं नानात्वदर्शनं निन्द्यते “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४ ।३ ।२३) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १ ।४ ।२) “उदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति” (तै० उ० २ ।७ ।१) “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ ।४ ।६; ४ ।५ ।७) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (क० उ० २ ।१ ।१०) इत्यादिवाक्यैश्चान्यैश्च ब्रह्मविद्भिः । यच्चैतत्तदेवं हि समञ्जसमृज्ववबोधं न्याय्यमित्यर्थः । यास्तु तार्किकपरिकल्पिताः कुदृष्टयस्ता अनृज्व्यो निरूप्यमाणा न घटनां प्राप्नुवन्तीत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥