अद्वैत प्रकरण - कारिका 15

मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा ।
उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथञ्चन ॥ १५ ॥

mṛllohavisphuliṅgādyaiḥ sṛṣṭiryā coditānyathā .
upāyaḥ so’vatārāya nāsti bhedaḥ kathañcana .. 15 ..


[उपनिषदोंमें] जो मृत्तिका, लोहखण्ड और विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्तोंद्वारा भिन्न-भिन्न प्रकारसे सृष्टिका निरूपण किया है वह [ब्रह्मात्मैक्यमें] बुद्धिका प्रवेश करानेका उपाय है; वस्तुतः उनमें कुछ भी भेद नहीं है ॥ १५ ॥

मृत्तिका, लोहपिण्ड और विस्फुलिङ्गादि के दृष्टान्तों का उपन्यास करके जो भिन्न-भिन्न प्रकार से सृष्टि को प्रकाशित अर्थात् कल्पित किया गया है वह सृष्टि का सम्पूर्ण प्रकार हमें जीव और परमात्मा का एकत्व निश्चय करानेवाली बुद्धि प्राप्त कराने के लिये है, जिस प्रकार कि प्राणसंवाद में प्राण की उत्कृष्टता का बोध कराने के लिये वागादि इन्द्रियों के असुरों द्वारा पाप से विद्ध हो जाने की आख्यायिका कल्पना की गयी है ।

पूर्व०—परन्तु यह बात भी तो सिद्ध नहीं हो सकती ।

सिद्धान्ती—नहीं; भिन्न-भिन्न शाखाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से प्राणसंवाद सुना जाने के कारण [उसका यही तात्पर्य होना चाहिये] । यदि यह संवाद वस्तुतः हुआ होता तो सम्पूर्ण शाखाओं में एक ही संवाद सुना जाता, परस्पर विरुद्ध भिन्न-भिन्न प्रकार से नहीं । परन्तु ऐसा सुना ही जाता है; इसलिये संवादश्रुतियों का तात्पर्य यथाश्रुत अर्थ में नहीं है । इसी प्रकार उत्पत्तिवाक्य भी समझने चाहिये ।

पूर्व०—प्रत्येक कल्प की सृष्टि के भेद के कारण संवादश्रुति और उत्पत्तिश्रुतियों में प्रत्येक सर्ग के अनुसार भेद है—यदि ऐसा मानें तो?

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि श्रुति का उपर्युक्त [ब्रह्मात्मैकत्व में] बुद्धिप्रवेशरूप प्रयोजन के अतिरिक्त अन्य कोई प्रयोजन ही नहीं है । प्राणसंवाद और उत्पत्तिश्रुतियों का इसके सिवा और कोई प्रयोजन नहीं कल्पना किया जा सकता । यदि कहो कि उनकी तद्रूपता प्राप्त करने के प्रयोजन से ध्यान के लिये ऐसा कहा गया है, तो ऐसा भी सम्भव नहीं है, क्योंकि कलह तथा उत्पत्ति या प्रलय की प्राप्ति किसी को इष्ट नहीं हो सकती । अतः उत्पत्ति आदि प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ आत्मैकत्वरूप बुद्धि की प्राप्ति के ही लिये हैं, उन्हें किसी और प्रयोजन के लिये मानना उचित नहीं है । अतः उत्पत्ति आदि के कारण होनेवाला भेद कुछ भी नहीं है ॥ १५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

मृल्लोहविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्तोपन्यासैः सृष्टिर्या चोदिता प्रकाशितान्यथान्यथा च स सर्वः सृष्टिप्रकारो जीवपरमात्मैकत्वबुद्ध्यवतारायोपायोऽस्माकम् । यथा प्राणसंवादे वागाद्यासुरपाप्मवेधाद्याख्यायिका कल्पिता प्राणवैशिष्ट्यबोधावताराय ।

तदप्यसिद्धमिति चेत् ।

न; शाखाभेदेष्वन्यथान्यथा च प्राणादिसंवादश्रवणात् ।

यदि हि संवादः परमार्थ एवाभूदेकरूप एव संवादः सर्वशाखास्वश्रोष्यत विरुद्धानेकप्रकारेण नाश्रौष्यत । श्रूयते तु; तस्मान्न तादर्थ्यं संवादश्रुतीनाम् । तथोत्पत्तिवाक्यानि प्रत्येतव्यानि ।

कल्पसर्गभेदात्संवादश्रुतीनामुत्पत्तिश्रुतीनां च प्रतिसर्गमन्यथात्वमिति चेत्?

न; निष्प्रयोजनत्वाद्यथोक्तबुद्ध्यवतारप्रयोजनव्यतिरेकेण । न ह्यन्यप्रयोजनवत्त्वं संवादोत्पत्तिश्रुतीनां शक्यं कल्पयितुम् । तथात्वप्रतिपत्तये ध्यानार्थमिति चेन्न; कलहोत्पत्तिप्रलयानां प्रतिपत्तेरनिष्टत्वात् । तस्मादुत्पत्त्यादि श्रुतय आत्मैकत्वबुद्ध्यवतारायैव नान्यार्थाः कल्पयितुं युक्ताः । अतो नास्त्युत्पत्त्यादिकृतो भेदः कथञ्चन ॥ १५ ॥

त्रिविध अधिकारी और उनके लिये उपासनाविधि

शंका—यदि “एकमेवाद्वितीयम्” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार परमार्थतः एकमात्र नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है, तो “अरे, इस आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिये” “जो आत्मा पापरहित है” “वह (अधिकारी) क्रतु (उपास्यसम्बन्धी संकल्प) करे” “आत्मा है—इस प्रकार ही उपासना करे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इस उपासना का उपदेश क्यों दिया गया है? तथा अग्निहोत्रादि कर्म भी क्यों बतलाये गये हैं?

समाधान—इसमें जो कारण है, सो सुनो—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यदि पर एवात्मा नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव एकः परमार्थः सन् “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । २) इत्यादिश्रुतिभ्योऽसदन्यत्किमर्थेयमुपासनोपदिष्टा “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” (बृ० उ० २ । ४ । ५) “य आत्मापहतपाप्मा” (छा० उ० ८ । ७ । १, ३) “स क्रतुं कुर्वीत” (छा० उ० ३ । १४ । १) “आत्मेत्येवोपासीत” (बृ० उ० १ । ४ । ७) इत्यादिश्रुतिभ्यः, कर्माणि चाग्निहोत्रादीनि?

शृणु तत्र कारणम्—