अद्वैत प्रकरण - कारिका 16

आश्रमास्त्रिविधा हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः ।
उपासनोपदिष्टेयं तदर्थमनुकम्पया ॥ १६ ॥

āśramāstrividhā hīnamadhyamotkṛṣṭadṛṣṭayaḥ .
upāsanopadiṣṭeyaṃ tadarthamanukampayā .. 16 ..


आश्रम (अधिकारी पुरुष) तीन प्रकार के हैं—हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले । उनपर कृपा करके उन्हीं के लिये यह उपासना उपदेश की गयी है ॥ १६ ॥

आश्रमाः—कर्माधिकारी आश्रमी एवं सन्मार्गगामी वर्णीलोग—क्योंकि ‘आश्रम’ शब्द उनका भी उपलक्षण करानेवाला है—तीन प्रकार के हैं । किस प्रकार? —हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टिवाले । अर्थात् जिनकी दृष्टि यानी दर्शनसामर्थ्य हीन—निकृष्ट, मध्यम और उत्कृष्ट है ऐसे मन्द, मध्यम और उत्तम बुद्धि की सामर्थ्य से सम्पन्न हैं ।

उन मन्द और मध्यम दृष्टिवाले आश्रमादि के लिये ही इस उपासना और कर्म का उपदेश किया गया है, ‘आत्मा एक और अद्वितीय ही है’ ऐसी जिनकी निश्चित उत्तम दृष्टि है, उनके लिये उसका उपदेश नहीं है । दयालु वेद ने उसका इसीलिये उपदेश किया है कि जिससे वे किसी प्रकार सन्मार्गगामी होकर “जिसका मन से मनन नहीं किया जा सकता, बल्कि जिसके द्वारा मन मनन किया कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान; यह, जिसकी तू उपासना करता है, ब्रह्म नहीं है” “वह तू है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित इस उत्तम एकत्वदृष्टि को प्राप्त कर सकें ॥ १६ ॥

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आश्रमा आश्रमिणोऽधिकृताः, वर्णिनश्च मार्गगाः, आश्रमशब्दस्य प्रदर्शनार्थत्वात्त्रिविधाः । कथम्? हीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः । हीना निकृष्टा मध्यमोत्कृष्टा च दृष्टिर्दर्शनसामर्थ्यं येषां ते मन्दमध्यमोत्तमबुद्धिसामर्थ्योपेता इत्यर्थः ।

उपासनोपदिष्टेयं तदर्थं मन्दमध्यमदृष्ट्याश्रमाद्यर्थं कर्माणि च, न चात्मैक एवाद्वितीय इति निश्चितोत्तमदृष्ट्यर्थं दयालुना वेदेनानुकम्पया सन्मार्गगाः सन्तः कथमिमामुत्तमामेकत्वदृष्टिं प्राप्नुयुरिति । “यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते” (के० उ० १ । ५) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८-१६) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ १६ ॥

अद्वैतात्मदर्शन किसीका विरोधी नहीं है

शास्त्र और युक्ति से निश्चित होने के कारण अद्वितीय आत्मदर्शन ही सम्यग्दर्शन है, उससे बाह्य होने के कारण और सब दर्शन मिथ्या हैं । द्वैतवादियों के दर्शन इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि वे राग-द्वेषादि दोषों के आश्रय हैं; किस प्रकार? [सो बतलाते हैं]—
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शास्त्रोपपत्तिभ्यामवधारितत्वादद्वयात्मदर्शनं सम्यग्दर्शनं तद्बाह्यत्वान्मिथ्यादर्शनमन्यत् । इतश्च मिथ्यादर्शनं द्वैतिनां रागद्वेषादिदोषास्पदत्वात् । कथम्?