अद्वैत प्रकरण - कारिका 17

स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् ।
परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥ १७ ॥

svasiddhāntavyavasthāsu dvaitino niścitā dṛḍham .
parasparaṃ virudhyante tairayaṃ na virudhyate .. 17 ..


द्वैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तों की व्यवस्था में दृढ आग्रही होने के कारण आपस में विरोध रखते हैं; परन्तु यह [अद्वैतात्मदर्शन] उनसे विरोध नहीं रखता ॥ १७ ॥

स्वसिद्धान्तव्यवस्था में अर्थात् अपनेअपने सिद्धान्त की रचना के नियमों में कपिल, कणाद, बुद्ध और अर्हत् (जिन)-की दृष्टियों का अनुसरण करनेवाले द्वैतवादी निश्चित हैं; अर्थात् यह परमार्थतत्त्व इसी प्रकार है अन्यथा नहीं—इस प्रकार अपने-अपने सिद्धान्त में अनुरक्त हो अपने प्रतिपक्षी को देखकर उससे द्वेष करते हैं । इस तरह राग-द्वेष से युक्त हो अपनेअपने सिद्धान्त के दर्शन के कारण ही परस्पर एक-दूसरे से विरोध मानते हैं ।

उन परस्पर विरोध माननेवालों से हमारा यह आत्मैकत्वदर्शनरूप वैदिकसिद्धान्त सबसे अभिन्न होने के कारण विरोध नहीं मानता; जिस प्रकार कि अपने हाथ-पाँव आदि से किसीका विरोध नहीं होता । इस प्रकार रागद्वेषादि दोषों का आश्रय न होने के कारण आत्मैकत्वबुद्धि ही सम्यग्दृष्टि है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १७ ॥

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स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु स्वसिद्धान्तरचनानियमेषु कपिलकणादबुद्धार्हतादिदृष्ट्यनुसारिणो द्वैतिनो निश्चिताः । एवमेवैष परमार्थो नान्यथेति तत्र तत्रानुरक्ताः प्रतिपक्षं चात्मनः पश्यन्तस्तं द्विषन्त इत्येवं रागद्वेषोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शननिमित्तम् एव परस्परमन्योन्यं विरुध्यन्ते ।

तैरन्योन्यविरोधिभिरस्मदीयोऽयं वैदिकः सर्वानन्यवादात्मैकत्वदर्शनपक्षो न विरुध्यते यथा स्वहस्तपादादिभिः । एवं रागद्वेषादिदोषानास्पदत्वादात्मैकत्वबुद्धिरेव सम्यग्दर्शनमित्यभिप्रायः ॥ १७ ॥


अद्वैतात्मदर्शन के अविरोधी होने में हेतु

किस कारण उनसे इसका विरोध नहीं है—इसपर कहते हैं—
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केन हेतुना तैर्न विरुध्यत इत्युच्यते—