तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुद्ध्यते ॥ १८ ॥
advaitaṃ paramārtho hi dvaitaṃ tadbheda ucyate .
teṣāmubhayathā dvaitaṃ tenāyaṃ na viruddhyate .. 18 ..
अद्वैत परमार्थ है; और क्योंकि द्वैत यानी नानात्व उस अद्वैत का भेद अर्थात् उसका कार्य है, जैसा कि “एकमेवाद्वितीयम्” “तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि श्रुतियों से तथा समाधि, मूर्च्छा अथवा सुषुप्ति में अपने चित्त के स्फुरण का अभाव हो जाने पर द्वैत का भी अभाव हो जाने के कारण युक्ति से भी सिद्ध होता है; इसलिये द्वैत उसका भेद कहा जाता है ।
किन्तु उन द्वैतवादियों की दृष्टि में तो परमार्थतः और अपरमार्थतः दोनों प्रकार द्वैत ही है । यदि उन भ्रान्त पुरुषों की द्वैतदृष्टि है और हम भ्रमहीनों की अद्वैतदृष्टि है तो इस कारण से ही हमारे पक्ष का उनसे विरोध नहीं है । “इन्द्र माया से अनेक रूप धारण करता है” “उससे भिन्न दूसरा है ही नहीं” इत्यादि श्रुतियों से भी यही प्रमाणित होता है ।
जिस प्रकार मतवाले हाथी पर चढ़ा हुआ पुरुष किसी उन्मत्त भूमिस्थ मनुष्य के प्रति, उसके ऐसा कहने पर भी कि ‘मैं तेरे प्रतिद्वन्द्वी हाथी पर चढ़ा हुआ हूँ, तू अपना हाथी मेरी ओर बढ़ा दे’ विरोधबुद्धि न होने के कारण उसकी ओर हाथी नहीं ले जाता, उसी प्रकार [हमारा भी उनसे विरोध नहीं है] । तब, परमार्थतः तो ब्रह्मवेत्ता द्वैतवादियों का भी आत्मा ही है । इसीसे अर्थात् इसी कारण उनसे हमारे पक्ष का विरोध नहीं है ॥ १८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अद्वैतं परमार्थो हि यस्माद्द्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेदस्तद्भेदस्तस्य कार्यमित्यर्थः । “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६ । २ । २) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६ । २ । ३) इति श्रुतेरुपपत्तेश्च स्वचित्तस्पन्दनाभावे समाधौ मूर्च्छायां सुषुप्तौ चाभावात् । अतस्तद्भेद उच्यते द्वैतम् ।
द्वैतिनां तु तेषां परमार्थतश्चापरमार्थतश्चोभयथापि द्वैतमेव । यदि च तेषां भ्रान्तानां द्वैतदृष्टिरस्माकमद्वैतदृष्टिरभ्रान्तानाम्, तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (बृ० उ० २ । ५ । १९) “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।
यथा मत्तगजारूढ उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रतिगजारूढोऽहं गजं वाहय मां प्रतीति ब्रुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत् । ततः परमार्थतो ब्रह्मविदात्मैव द्वैतिनाम् । तेनायं हेतुनास्मत्पक्षो न विरुध्यते तैः ॥ १८ ॥