तत्त्वतो भिद्यमाने हि मर्त्यताममृतं व्रजेत् ॥ १९ ॥
māyayā bhidyate hyetannānyathājaṃ kathañcana .
tattvato bhidyamāne hi martyatāmamṛtaṃ vrajet .. 19 ..
जो परमार्थ सत् अद्वैत है वह तिमिरदोष से प्रतीत होनेवाले अनेक चन्द्रमा और सर्प-धारादि भेदों से विभिन्न दीखनेवाली रज्जु के समान माया से ही भेदवान् प्रतीत होता है, परमार्थतः नहीं, क्योंकि आत्मा निरवयव है । जो वस्तु सावयव होती है वही अवयवों के भेद से भेद को प्राप्त होती है; जिस प्रकार घट आदि भेदों से मृत्तिका । अतः निरवयव और अजन्मा आत्मा [माया के सिवा] और किसी प्रकार भेद को प्राप्त नहीं हो सकता—यह इसका अभिप्राय है ।
यदि उसमें तत्त्वतः भेद हो तो अमृत, अज, अद्वय और स्वभाव से सत्स्वरूप होकर भी आत्मा मर्त्यता को प्राप्त हो जायगा, जिस तरह कि अग्नि शीतलता को प्राप्त हो जाय । और अपने स्वभाव से विपरीत अवस्था को प्राप्त हो जाना सम्पूर्ण प्रमाणों से विरुद्ध होने के कारण किसी को इष्ट नहीं हो सकता । अतः अज और अद्वितीय आत्मतत्त्व माया से ही भेद को प्राप्त होता है, परमार्थतः नहीं । इसलिये द्वैत परमार्थ सत् नहीं है ॥ १९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यत्परमार्थसदद्वैतं मायया भिद्यते ह्येतत्तैमिरिकानेकचन्द्रवद्रज्जुः सर्पधारादिभिर्भेदैरिव न परमार्थतो निरवयवत्वादात्मनः । सावयवं ह्यवयवान्यथात्वेन भिद्यते । यथा मृद् घटादिभेदैः । तस्मान्निरवयवमजं नान्यथा कथञ्चन केनचिदपि प्रकारेण न भिद्यत इत्यभिप्रायः ।
तत्त्वतो भिद्यमाने ह्यमृतमजमद्वयं स्वभावतः सन्मर्त्यतां व्रजेत्; यथाग्निः शीतताम् । तच्चानिष्टं स्वभाववैपरीत्यगमनम्, सर्वप्रमाणविरोधात् । अजमव्ययमात्मतत्त्वं माययैव भिद्यते न परमार्थतः । तस्मान्न परमार्थसदद्वैतम् ॥ १९ ॥