यथा न जायते किञ्चिज्जायमानं समन्ततः ॥ २ ॥
ato vakṣyāmyakārpaṇyamajāti samatāṃ gatam .
yathā na jāyate kiñcijjāyamānaṃ samantataḥ .. 2 ..
इसलिये मैं अकार्पण्य अकृपणभाव अर्थात् अजन्मा ब्रह्म का वर्णन करता हूँ । “जहाँ अन्य अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है और अन्य को ही जानता है वह अल्प है, वह मरणशील और असत् है” “विकार वाणी से आरम्भ होनेवाला नाममात्र है” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार उपर्युक्त जातब्रह्म तो कृपणता का ही आश्रय है । उससे विपरीत बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा भूमासंज्ञक ब्रह्म अकार्पण्यरूप है, जिसे प्राप्त होने पर अविद्याकृत सम्पूर्ण कृपणता की निवृत्ति हो जाती है; उस कृपणभाव से रहित ब्रह्म का मैं वर्णन करूँगा—यह इसका तात्पर्य है ।
वह अजाति अर्थात् जिसकी जाति न हो और समता को प्राप्त अर्थात् सबकी समानता को प्राप्त है । ऐसा क्यों है?
क्योंकि उसमें अवयवों की विषमता का अभाव है । जो वस्तु सावयव होती है वह अवयवों की विषमता को प्राप्त होने के कारण ‘उत्पन्न होती है’ ऐसे कही जाती है । किन्तु यह ब्रह्म तो निरवयव होने के कारण समता को प्राप्त है, इसलिये किन्हीं भी अवयवों के रूप में प्रस्फुटित नहीं होता । अतः यह सब ओर से अजाति अर्थात् अकार्पण्यरूप है । जिस प्रकार कि कुछ भी उत्पन्न नहीं होता अर्थात् रज्जु-सर्प के समान आविद्यकदृष्टि से उत्पन्न होता हुआ भी जिस प्रकार उत्पन्न नहीं होता—सब ओर अजन्मा ब्रह्म ही रहता है उस प्रकार को श्रवण करो—यह इसका अभिप्राय है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमकृपणभावमजं ब्रह्म । तद्धि कार्पण्यास्पदम् “यत्रान्योऽन्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं मर्त्यमसत्” (छा० उ० ७ ।२४ ।१) “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ ।१ ।४) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तद्विपरीतं सबाह्याभ्यन्तरमजमकार्पण्यं भूमाख्यं ब्रह्म । यत्प्राप्त्याविद्याकृतसर्वकार्पण्यनिवृत्तिस्तदकार्पण्यं वक्ष्यामीत्यर्थः ।
तदजाति, अविद्यमाना जातिरस्य समतां गतं सर्वसाम्यं गतम् । कस्मात्?
अवयववैषम्याभावात् । यद्धि सावयवं वस्तु तदवयववैषम्यं गच्छज्जायत इत्युच्यते । इदं तु निरवयवत्वात् समतां गतमिति न कैश्चिदवयवैः स्फुटत्यतोऽजात्यकार्पण्यम् । समन्ततः समन्ताद्यथा न जायते किञ्चिदल्पमपि न स्फुटति रज्जुसर्पवदविद्याकृतदृष्ट्या जायमानं येन प्रकारेण न जायते सर्वतोऽजमेव ब्रह्म भवति तथा तं प्रकारं शृण्वित्यर्थः ॥ २ ॥