अजातस्यैव भावस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो भावो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ २० ॥
अजातो ह्यमृतो भावो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ २० ॥
ajātasyaiva bhāvasya jātimicchanti vādinaḥ .
ajāto hyamṛto bhāvo martyatāṃ kathameṣyati .. 20 ..
द्वैतवादीलोग जन्महीन आत्मा के भी जन्म की इच्छा करते हैं; किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजन्मा और मरणहीन है वह मरणशीलता को किस प्रकार प्राप्त हो सकता है? ॥ २० ॥
किन्तु जो कोई उपनिषदों की व्याख्या करनेवाले बहुभाषी ब्रह्मवादी लोग अजात और अमृतस्वरूप आत्मतत्त्व की जाति यानी उत्पत्ति परमार्थतः ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके मत में यदि वह उत्पन्न होता है तो अवश्य ही मरणशीलता को भी प्राप्त हो जायगा । किन्तु वह आत्मतत्त्व स्वभाव से अजात और अमृत होकर भी किस प्रकार मरणशीलता को प्राप्त हो सकता है? अतः तात्पर्य यह है कि वह किसी प्रकार अपने स्वभाव से विपरीत मरणशीलता को प्राप्त नहीं हो सकता ॥ २० ॥
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ये तु पुनः केचिदुपनिषद्व्याख्यातारो ब्रह्मवादिनो वावदूका अजातस्यैवात्मतत्त्वस्य अमृतस्य स्वभावतो जातिम् उत्पत्तिमिच्छन्ति परमार्थत एव तेषां जातं चेत्तदेव मर्त्यतामेष्यत्यवश्यम् । स चाजातो ह्यमृतो भावः स्वभावतः सन्नात्मा कथं मर्त्यतामेष्यति? न कथञ्चन मर्त्यत्वं स्वभाववैपरीत्यमेष्यतीत्यर्थः ॥ २० ॥
क्योंकि—
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यस्मात्—