अद्वैत प्रकरण - कारिका 21

न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथञ्चिद्भविष्यति ॥ २१ ॥

na bhavatyamṛtaṃ martyaṃ na martyamamṛtaṃ tathā .
prakṛteranyathābhāvo na kathañcidbhaviṣyati .. 21 ..


मरणहीन वस्तु कभी मरणशील नहीं होती और मरणशील कभी अमर नहीं होती । किसी भी प्रकार स्वभाव की विपरीतता नहीं हो सकती ॥ २१ ॥
लोक में मरणहीन वस्तु मरणशील नहीं होती और न मरणशील वस्तु मरणहीन ही होती है । अतः अग्नि की उष्णता के समान प्रकृति अर्थात् स्वभाव की विपरीतता—अपने स्वरूप से च्युति किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ २१ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
न भवत्यमृतं मर्त्यं लोके नापि मर्त्यममृतं तथा । ततः प्रकृतेः स्वभावस्यान्यथाभावः स्वतः प्रच्युतिर्न कथञ्चिद्भविष्यति, अग्नेरिवौष्ण्यस्य ॥ २१ ॥