अद्वैत प्रकरण - कारिका 22

स्वभावेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ २२ ॥

svabhāvenāmṛto yasya bhāvo gacchati martyatām .
kṛtakenāmṛtastasya kathaṃ sthāsyati niścalaḥ .. 22 ..


जिसके मत में स्वभाव से मरणहीन पदार्थ भी मर्त्यत्व को प्राप्त हो जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होने के कारण वह अमृत पदार्थ चिरस्थायी कैसे हो सकता है? ॥ २२ ॥

किन्तु जिस वादी के मत में स्वभाव से अमृत पदार्थ भी मर्त्यता को प्राप्त होता है अर्थात् परमार्थतः जन्म लेता है उसकी यह प्रतिज्ञा कि उत्पत्ति से पूर्व वह पदार्थ स्वभाव से अमरणधर्मा है—मिथ्या ही है । [यदि ऐसा न मानें] तो फिर कृतक होने के कारण उसका स्वभाव अमरत्व कैसे हो सकता है? और इस प्रकार कृतक होने से ही वह अमृत पदार्थ निश्चल यानी अमृतस्वभाव भी कैसे रह सकता है?

अर्थात् वह कभी ऐसा नहीं रह सकता । अतः आत्मा के जन्म बतलानेवाले के मत में तो अजन्मा वस्तु कोई है ही नहीं । उसके लिये यह सब मरणशील ही है । इससे यह अभिप्राय हुआ कि [उसके मत में] मोक्ष होने का प्रसंग है ही नहीं ॥ २२ ॥

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यस्य पुनर्वादिनः स्वभावेन अमृतो भावो मर्त्यतां गच्छति परमार्थतो जायते तस्य प्रागुत्पत्तेः स भावः स्वभावतोऽमृत इति प्रतिज्ञा मृषैव । कथं तर्हि कृतकेनामृतस्तस्य भावः? कृतकेनामृतः स कथं स्थास्यति निश्चलोऽमृतस्वभावस्तथा न कथञ्चित्स्थास्यत्यात्मजातिवादिनः सर्वदाजं नाम नास्त्येव; सर्वमेतन्मर्त्यम् । अतोऽनिर्मोक्षप्रसङ्ग इत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥

सृष्टिश्रुति की संगति

शंका—किन्तु अजातिवादी के मत में सृष्टि का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती?

समाधान—हाँ ठीक है, सृष्टि का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी है; किन्तु उसका उद्देश्य दूसरा है । “उपायः सोऽवताराय” इस प्रकार हम उसका उद्देश्य पहले (अद्वैत० १५ में) बता ही चुके हैं । इस प्रकार यद्यपि इस शंका का पहले समाधान किया जा चुका है तो भी ‘सृष्टिश्रुति के अक्षरों की अनुकूलता का हमारे विवक्षित अर्थ से विरोध है’ इस शंका का परिहार करने के लिये ही, इस समय तत्सम्बन्धी शंका और समाधान का पुनः उल्लेख किया जाता है—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

नन्वजातिवादिनः सृष्टिप्रतिपादिका श्रुतिर्न संगच्छते प्रामाण्यम्?

बाढं विद्यते सृष्टिप्रतिपादिका श्रुतिः; सा त्वन्यपरा । उपायः सोऽवतारायेत्यवोचाम् । इदानीमुक्तेऽपि परिहारे पुनश्चोद्यपरिहारौ विवक्षितार्थं प्रति सृष्टिश्रुत्यक्षराणामानुलोम्यविरोधाशङ्कामात्रपरिहारार्थौ—