अद्वैत प्रकरण - कारिका 23

भूततोऽभूततो वापि सृज्यमाने समा श्रुतिः ।
निश्चितं युक्तियुक्तं च यत्तद्भवति नेतरत् ॥ २३ ॥

bhūtato’bhūtato vāpi sṛjyamāne samā śrutiḥ .
niścitaṃ yuktiyuktaṃ ca yattadbhavati netarat .. 23 ..


पारमार्थिक अथवा अपारमार्थिक किसी भी प्रकार की सृष्टि होने में श्रुति तो समान ही होगी । अतः उनमें जो निश्चित और युक्तियुक्त मत हो वही [श्रुति का अभिप्राय] हो सकता है, अन्य नहीं ॥ २३ ॥

वस्तु के भूततः यानी परमार्थतः रचे जाने में अथवा अभूततः यानी माया से मायावी द्वारा रचे जाने में सृष्टिश्रुति तो समान ही होगी । यदि कहो कि गौण और मुख्य दोनों अर्थ होने पर शब्द का मुख्य अर्थ लेना ही उचित है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अन्य प्रकार से न तो सृष्टि सिद्ध ही होती है और न उसका कुछ प्रयोजन ही है—यह हम पहले कह चुके हैं । “आत्मा बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है” इस श्रुति के अनुसार सब प्रकार की गौण और मुख्य सृष्टि आविद्यक सृष्टिसम्बन्धिनी ही है, परमार्थतः नहीं ।

अतः श्रुति ने जो एक, अद्वितीय, अजन्मा और अमृत तत्त्व निश्चित किया है वही युक्तियुक्त अर्थात् युक्ति से भी सिद्ध होता है, ऐसा प्रतिपादन कर चुके हैं वही श्रुति का तात्पर्य हो सकता है; अन्य अर्थ कभी और किसी अवस्था में नहीं हो सकता ॥ २३ ॥

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भूततः परमार्थतः सृज्यमाने वस्तुन्यभूततो मायया वा मायाविनेव सृज्यमाने वस्तुनि समा तुल्या सृष्टिश्रुतिः । ननु गौणमुख्ययोर्मुख्ये शब्दार्थप्रतिपत्तिर्युक्ता । न, अन्यथा सृष्टेरप्रसिद्धत्वान्निष्प्रयोजनत्वाच्चेत्यवोचाम । अविद्यासृष्टिविषयैव सर्वा गौणी मुख्या च सृष्टिर्न परमार्थतः “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २ । १ । २) इति श्रुतेः ।

तस्माच्छ्रुत्या निश्चितं यदेकमेवाद्वितीयमजममृतमिति युक्तियुक्तं च युक्त्या च सम्पन्नं तदेवेत्यवोचाम पूर्वैर्ग्रन्थैः । तदेव श्रुत्यर्थो भवति नेतरत्कदाचिदपि ॥ २३ ॥


यह श्रुति का निश्चय किस प्रकार है? सो बतलाते हैं —
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कथं श्रुतिनिश्चयः? इत्याह —