अजायमानो बहुधा मायया जायते तु सः ॥ २४ ॥
neha nāneti cāmnāyādindro māyābhirityapi .
ajāyamāno bahudhā māyayā jāyate tu saḥ .. 24 ..
यदि वास्तव में ही सृष्टि हुई है तो नाना वस्तु सत्य ही हैं; ऐसी अवस्था में उनका अभाव प्रदर्शित करने के लिये कोई शास्त्र-वचन नहीं होना चाहिये था । किन्तु द्वैतभाव का निषेध करने के लिये “यहाँ नाना वस्तु कुछ नहीं है” इत्यादि शास्त्र-वचन है ही । अतः प्राणसंवाद के समान आत्मैकत्व की प्राप्ति के लिये कल्पना की हुई सृष्टि अयथार्थ ही है; क्योंकि “इन्द्र माया से [अनेकरूप हो जाता है]” इस श्रुति में सृष्टि का अयथार्थत्वप्रतिपादक ‘माया’ शब्द से निर्देश किया गया है ।
शंका — ‘माया’ शब्द तो प्रज्ञावाचक है [इसलिये इससे सृष्टि का मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होता] ।
समाधान — ठीक है, आविद्यक होने के कारण इन्द्रियप्रज्ञा का मायात्व माना गया है; इसलिये उसमें कोई दोष नहीं है । अतः माया से अर्थात् अविद्यारूप इन्द्रियप्रज्ञा से; जैसा कि “उत्पन्न न होकर भी अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है” इस श्रुति से सिद्ध होता है । अतः वह माया से ही उत्पन्न होता है । यहाँ ‘तु’ शब्द निश्चयार्थक है । अर्थात् माया से ही [उत्पन्न होता है] । अग्नि में शीतलता और उष्णता के समान जन्म न लेना और अनेक प्रकार से जन्म लेना एक ही वस्तु में सम्भव नहीं है ।
“उस अवस्था में एकत्व का साक्षात्कार करनेवाले पुरुष को क्या मोह और क्या शोक हो सकता है? ” इत्यादि श्रुति के अनुसार फलयुक्त होने के कारण तथा “[जो नानात्व देखता है] वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है” इस श्रुति से सृष्टि आदि भेददृष्टि की निन्दा की जाने के कारण भी आत्मैकत्वदर्शन ही श्रुति का निश्चित अर्थ है ॥ २४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यदि हि भूतत एव सृष्टिः स्यात्ततः सत्यमेव नाना वस्त्विति तदभावप्रदर्शनार्थमाम्नायो न स्यात् । अस्ति च “नेह नानाऽस्ति किञ्चन” (क० उ० २ । १ । ११) इत्यादिराम्नायो द्वैतभावप्रतिषेधार्थः । तस्मादात्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्था कल्पिता सृष्टिरभूतैव प्राणसंवादवत् । “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २ । ५ । १९) इत्यभूतार्थप्रतिपादकेन मायाशब्देन व्यपदेशात् ।
ननु प्रज्ञावचनो मायाशब्दः ।
सत्यम्; इन्द्रियप्रज्ञाया अविद्यामयत्वेन मायात्वाभ्युपगमाददोषः । मायाभिरिन्द्रिय प्रज्ञाभिः अविद्यारूपाभिरित्यर्थः, “अजायमानो बहुधा विजायते” इति श्रुतेः, तस्मान्माययैव जायते तु सः । तु शब्दोऽवधारणार्थः — माययैवेति । न ह्यजायमानत्वं बहुधा जन्म चैकत्र सम्भवति, अग्नाविव शैत्यमौष्ण्यं च ।
फलवत्त्वाच्चात्मैकत्वदर्शनमेव श्रुतिनिश्चितोऽर्थः “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ई० उ० ७) इत्यादिमन्त्रवर्णात्; “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति” (क० उ० २ । १ । १०) इति निन्दितत्वाच्च सृष्ट्यादिभेददृष्टेः ॥ २४ ॥