को न्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ॥ २५ ॥
sambhūterapavādācca sambhavaḥ pratiṣidhyate .
ko nvenaṃ janayediti kāraṇaṃ pratiṣidhyate .. 25 ..
“जो सम्भूति (हिरण्यगर्भ)-की उपासना करते हैं वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं” इस प्रकार सम्भूति के उपास्यत्व की निन्दा की जाने के कारण कार्यवर्ग का प्रतिषेध किया गया है । यदि सम्भूति परमार्थसत्स्वरूप होती तो उसकी निन्दा की जानी सम्भव नहीं थी ।
शंका — सम्भूति के उपास्यत्व की जो निन्दा की गयी है वह तो विनाश (कर्म)-के साथ सम्भूति (देवतोपासना)-का समुच्चयविधान करने के लिये है; जैसा कि “जो अविद्या की उपासना करते हैं वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं” इस वाक्य से सिद्ध होता है ।
समाधान — सचमुच ही, सम्भूतिविषयक देवतादर्शन और ‘विनाश’ शब्दवाच्य कर्म का समुच्चयविधान करने के लिये ही सम्भूति का अपवाद किया गया है; तथापि जिस प्रकार ‘विनाश’ संज्ञक कर्म स्वाभाविक अज्ञानजनित प्रवृत्तिरूप मृत्यु को पार करने के लिये है, उसी प्रकार पुरुष के संस्कार के लिये विहित देवतादर्शन और कर्म का समुच्चय कर्मफल के राग से होनेवाली प्रवृत्तिरूपा जो साध्य-साधनलक्षणा दो प्रकार की वासनामयी मृत्यु है, उसे पार करने के लिये है । इस प्रकार एषणाद्वयरूप मृत्यु की अशुद्धि से मुक्त हुआ पुरुष ही संस्कारसम्पन्न हो सकता है । अतः देवतादर्शन और कर्मसमुच्चयलक्षणा अविद्या मृत्यु से पार होने के लिये ही है ।
इसी प्रकार एषणाद्वयलक्षणा अविद्यारूप मृत्यु से पार हुए तथा उपनिषच्छास्त्र के अर्थ की आलोचना में तत्पर विरक्त पुरुष को ब्रह्मात्मैक्यरूप विद्या की उत्पत्ति दूर नहीं है; इसीलिये ऐसा कहा जाता है कि पहले होनेवाली अविद्या की अपेक्षा से पीछे प्राप्त होनेवाली ब्रह्मविद्या, जो अमृतत्व का साधन है, एक ही पुरुष से सम्बन्ध रखने के कारण अविद्या से समुच्चित की जाती है । अतः अमृतत्व के साक्षात् साधन ब्रह्मविद्या की अपेक्षा अन्य प्रयोजनवाला होने से सम्भूति का अपवाद निन्दा ही के लिये किया गया है । वह यद्यपि अशुद्धि के क्षय का कारण है, तो भी अतन्निष्ठ (मोक्ष का साक्षात् हेतु न) होने के कारण [उसकी निन्दा ही की गयी है] । इसलिये सम्भूति का अपवाद किया जाने के कारण उसका सत्त्व आपेक्षिक ही है; इसी आशय से परमार्थ सत् आत्मैकत्व की अपेक्षा से अमृतसंज्ञक सम्भूति का प्रतिषेध किया गया है ।
इस प्रकार अविद्या द्वारा खड़ा किया गया मायारचित जीव जब अविद्या का नाश होने पर अपने स्वरूप से स्थित हो जाता है तब उसे परमार्थतः कौन उत्पन्न कर सकता है? रज्जु में अविद्या से आरोपित सर्प को विवेक से नष्ट हो जाने पर, फिर कोई उत्पन्न नहीं कर सकता । उसी प्रकार इसे भी कोई उत्पन्न नहीं कर सकता । ‘को न्वेनम्’ इत्यादि श्रुति आक्षेपार्थक है [प्रश्नार्थक नहीं] इसलिये इससे कारण का प्रतिषेध किया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि अविद्या से उत्पन्न हुए इस जीव का विद्या द्वारा नाश हो जाने पर फिर इसे उत्पन्न करनेवाला कोई भी कारण नहीं है, जैसा कि “यह कहीं से (किसी कारण से) किसी रूप में उत्पन्न नहीं हुआ” इत्यादि श्रुति से प्रमाणित होता है ॥ २५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
“अन्धं तमः प्रविशन्ति ये सम्भूतिमुपासते” (ई० उ० १२) इति सम्भूतेरुपास्यत्वापवादात्सम्भवः प्रतिषिध्यते । न हि परमार्थतः सम्भूतायां सम्भूतौ तदपवाद उपपद्यते ।
ननु विनाशेन सम्भूतेः समुच्चयविध्यर्थः सम्भूत्यपवादः । यथा “अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते” (ई० उ० ९) इति ।
सत्यमेव देवतादर्शनस्य सम्भूतिसमुच्चयस्य विषयस्य विनाशशब्दवाच्यस्य कर्मणः समुच्चयविधानार्थः सम्भूत्यपवादः । तथापि विनाशाख्यस्य कर्मणः स्वाभाविकाज्ञानप्रवृत्तिरूपस्य मृत्योरतितरणार्थत्ववद्देवतादर्शनकर्मसमुच्चयस्य पुरुषसंस्कारार्थस्य कर्मफलरागप्रवृत्तिरूपस्य साध्यसाधनैषणाद्वयलक्षणस्य मृत्योरतितरणार्थत्वम् । एवं ह्येषणाद्वयरूपान्मृत्योरशुद्धेर्वियुक्तः पुरुषः संस्कृतः स्यादतो मृत्योरतितरणार्था देवतादर्शनकर्मसमुच्चयलक्षणा ह्यविद्या ।
एवमेव एषणालक्षणाविद्याया सहायेन मृत्योरतितीर्णस्य सतः विरक्तस्योपनिषच्छास्त्रार्थालोचनपरस्य नान्तरीयकी परमात्मैकत्वविद्योत्पत्तिरिति पूर्वभाविनीमविद्यामपेक्ष्य पश्चाद्भाविनी ब्रह्मविद्यामृतत्वसाधनैकेन पुरुषेण सम्बध्यमानाविद्यया समुच्चीयत इत्युच्यते । अतोऽन्यार्थत्वादमृतत्वसाधनं ब्रह्मविद्यामपेक्ष्य निन्दार्थ एव भवति सम्भूत्यपवादः । यद्यप्यशुद्धिवियोगहेतुः, अतन्निष्ठत्वात् । अत एव सम्भूतेरपवादात्सम्भूतेरापेक्षिकमेव सत्त्वमिति परमार्थसदात्मैकत्वमपेक्ष्य अमृताख्यः सम्भवः प्रतिषिध्यते ।
एवं मायानिर्मितस्यैव विद्योत्पत्त्यनन्तरं जीवस्याविद्यया प्रत्युपजीवभावस्य स्थापितस्याविद्याअनुपपत्ति- नाशे स्वभावरूपप्रतिपादनम् त्वात्परमार्थतः को न्वेनं जनयेत् । न हि रज्ज्वामविद्यारोपितं सर्पं पुनर्विवेकतो नष्टं जनयेत्कश्चित् । तथा न कश्चिदेनं जनयेदिति को न्वित्याक्षेपार्थत्वात्कारणं प्रतिषिध्यते । अविद्योद्भूतस्य नष्टस्य जनयितृकारणं न किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः “नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्” (क० उ० १ । २ । १८) इति श्रुतेः ॥ २५ ॥