स एष नेति नेतीति व्याख्यातं निह्नुते यतः ।
सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाजं प्रकाशते ॥ २६ ॥
सर्वमग्राह्यभावेन हेतुनाजं प्रकाशते ॥ २६ ॥
sa eṣa neti netīti vyākhyātaṃ nihnute yataḥ .
sarvamagrāhyabhāvena hetunājaṃ prakāśate .. 26 ..
क्योंकि ‘स एष नेति नेति’ (वह यह आत्मा यह नहीं है, यह नहीं है) इत्यादि श्रुति आत्मा के अग्राह्यत्व के कारण [उसके विषय में] पहले बतलाये हुए सभी भावों का निषेध करती है; अतः इस [निषेधरूप] हेतु के द्वारा ही अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २६ ॥
“अथात आदेशो नेति नेति[ * ]” इस प्रकार समस्त विशेषणों के प्रतिषेध द्वारा प्रतिपादन किये हुए आत्मा का दुर्बोधत्व माननेवाली श्रुति बारंबार दूसरे उपाय से उसी का प्रतिपादन करने की इच्छा से, पहले जो कुछ व्याख्या की है उस सभी का अपह्नव (असत्यताप्रतिपादन) करती है । वह ग्राह्य—बुद्धि के जन्य विषयों का अपलाप करती है । अर्थात् “स एष नेति नेति” इस प्रकार आत्मा की अदृश्यता दिखलानेवाली श्रुति, उपाय की उपेयनिष्ठता को न जाननेवाले लोगों को उपायरूप से बतलाये हुए विषय उपेय के समान ग्राह्य न हो जायँ—इसलिये, अग्राह्यतारूप हेतु से उनका निषेध करती है—यही इसका अभिप्राय है । तदनन्तर इस प्रकार उपाय की उपेयनिष्ठता को जाननेवाले और उपेय की नित्यैकस्वरूपता को भी समझनेवाले पुरुषों को यह बाहर-भीतर विद्यमान अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है ॥ २६ ॥
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सर्वविशेषप्रतिषेधेन “अथात आदेशो नेति नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) इति प्रतिपादितस्यात्मनो दुर्बोधत्वं मन्यमाना श्रुतिः पुनः पुनरुपायान्तरत्वेन तस्यैव प्रतिपिपादयिषया यद्व्याख्यातं तत्सर्वं निह्नुते, ग्राह्यं जनिमद्बुद्धिविषयमपलपति । अर्थात् “स एष नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यात्मनोऽदृश्यतां दर्शयन्ती श्रुतिः उपायस्योपेयनिष्ठतामजानत उपायत्वेन व्याख्यातस्योपेयवद्ग्राह्यता मा भूदित्यग्राह्यभावेन हेतुना कारणेन निह्नुत इत्यर्थः । ततश्चैवमुपायस्योपेयनिष्ठतामेव जानत उपेयस्य च नित्यैकरूपत्वमिति तस्य सबाह्याभ्यन्तरमजमात्मतत्त्वं प्रकाशते स्वयमेव ॥ २६ ॥
सद्वस्तु की उत्पत्ति मायिक होती है
इस प्रकार सैकड़ों श्रुतिवाक्यों से यही निश्चित होता है कि बाहर-भीतर वर्तमान अजन्मा आत्मतत्त्व अद्वितीय है, उससे भिन्न और कुछ नहीं है । यही बात अब युक्ति से फिर निश्चय की जाती है; इसीसे कहते हैं—
[ * ]: इस (मूर्त और अमूर्त के उपन्यास)-के अनन्तर [निर्विशेष आत्मा का बोध कराने के लिये] यह नहीं है, यह नहीं है—ऐसा उपदेश है ।
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एवं हि श्रुतिवाक्यशतैः सबाह्याभ्यन्तर मजमात्मतत्त्वमद्वयं न ततोऽन्यदस्तीति निश्चितमेतत् । युक्त्या च अधुनैतदेव पुनर्निर्धार्यत इत्याह —