अद्वैत प्रकरण - कारिका 27

सतो हि मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतः ।
तत्त्वतो जायते यस्य जातं तस्य हि जायते ॥ २७ ॥

sato hi māyayā janma yujyate na tu tattvataḥ .
tattvato jāyate yasya jātaṃ tasya hi jāyate .. 27 ..


सद्वस्तु का जन्म माया से ही हो सकता है, वस्तुतः नहीं । जिसके मत में वस्तुतः जन्म होता है उसके सिद्धान्तानुसार भी उत्पत्तिशील वस्तु का ही जन्म हो सकता है ॥ २७ ॥

उस आत्मतत्त्व के विषय में यह शंका होती है कि यदि आत्मतत्त्व सर्वदा अग्राह्य ही है तो वह असत् होना चाहिये । परन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसका कार्य देखा जाता है । जिस प्रकार सत्स्वरूप मायावी का माया से जन्म लेना कार्य है उसी प्रकार यह दिखलायी देनेवाला जगत् का जन्मरूप कार्य जगज्जन्मरूप माया के आश्रयभूत परमार्थ सत् मायावी के समान आत्मा का बोध कराता है, क्योंकि माया से रचे हुए हाथी आदि कार्य के समान सत् अर्थात् विद्यमान कारण से ही जगत् का जन्म होना सम्भव है, किसी अविद्यमान कारण से नहीं । तथा तत्त्वतः तो आत्मा का जन्म होना सम्भव है ही नहीं ।

अथवा [यों समझो कि] जिस प्रकार रज्जु आदि से सर्पादि के समान सत् अर्थात् विद्यमान वस्तु का जन्म माया से ही हो सकता है, तत्त्वतः नहीं, उसी प्रकार अग्राह्य होने पर भी सत्स्वरूप आत्मा का रज्जु से सर्प के समान जगद्रूप से जन्म होना माया से ही सम्भव है—उस अजन्मा आत्मा का तत्त्वतः जन्म नहीं हो सकता ।

किन्तु जिस वादी के मत में परमार्थ सत् आत्मतत्त्व ही जगद्रूप से उत्पन्न होता है उसके सिद्धान्तानुसार यह नहीं कहा जा सकता कि अजन्मा वस्तु का ही जन्म होता है, क्योंकि इससे विरोध उपस्थित होता है । अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि उसके मतानुसार किसी जन्मशील का ही जन्म होता है । किन्तु इस प्रकार जन्मशील से ही जन्म मानने पर अनवस्था उपस्थित हो जाती है; अतः यह सिद्ध हुआ कि आत्मतत्त्व अजन्मा और एक ही है ॥ २७ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

तत्रैतत्स्यात्सदाग्राह्यमेव चेदसदेवात्मतत्त्वमिति । तन्न, कार्यग्रहणात् । यथा सतो मायाविनो मायया जन्म कार्यम् । एवं जगतो जन्म कार्य गृह्यमाणं मायाविनमिव परमार्थसन्तम् आत्मानं जगज्जन्ममायास्पदम् अवगमयति । यस्मात्सतो हि विद्यमानात्कारणान्मायानिर्मितस्य हस्त्यादिकार्यस्येव जगज्जन्म युज्यते नासतः कारणात् । न तु तत्त्वत एवात्मनो जन्म युज्यते ।

अथ वा सतो विद्यमानस्य वस्तुनो रज्ज्वादेः सर्पादिवत् मायया जन्म युज्यते न तु तत्त्वतो यथा तथाग्राह्यस्यापि सत एवात्मनो रज्जुसर्पवज्जगद्रूपेण मायया जन्म युज्यते । न तु तत्त्वत एवाजस्यात्मनो जन्म ।

यस्य पुनः परमार्थसदजमात्मतत्त्वं जगद्रूपेण जायते वादिनो न हि तस्याजं जायत इति शक्यं वक्तुं विरोधात् । ततस्तस्यार्थाज्जातं जायत इत्यापन्नं ततश्चानवस्था जाताज्जायमानत्वेन । तस्मादजमेकमेवात्मतत्त्वमिति सिद्धम् ॥ २७ ॥