यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ २९ ॥
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ २९ ॥
yathā svapne dvayābhāsaṃ spandate māyayā manaḥ .
tathā jāgraddvayābhāsaṃ spandate māyayā manaḥ .. 29 ..
जिस प्रकार स्वप्नकाल में मन माया से ही द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है, उसी प्रकार जाग्रत्काल में भी वह माया से ही द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है ॥ २९ ॥
जिस प्रकार रज्जु में कल्पना किया हुआ सर्प रज्जुरूप से देखे जाने पर सत् है उसी प्रकार मन भी परमार्थज्ञानरूप आत्मस्वरूप से देखा जाने पर सत् है । वह रज्जु में सर्प के समान स्वप्नावस्था में माया से ही ग्राह्य-ग्राहकरूप द्वैत के आभासरूप से स्फुरित होता है । इसी प्रकार यह मन ही जाग्रत्-अवस्था में भी माया से [विविध रूपों में] स्फुरित होता है; अर्थात् स्फुरित होता-सा मालूम होता है [वास्तव में स्फुरित भी नहीं होता] ॥ २९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा रज्ज्वां विकल्पितः सर्पो रज्जुरूपेणावेक्ष्यमाणः सन्नेवं मनः परमार्थविज्ञप्त्यात्मरूपेणावेक्ष्यमाणं सद् ग्राह्यग्राहकरूपेण द्वयाभासं स्पन्दते स्वप्ने मायया, रज्ज्वामिव सर्पः । तथा तद्वदेव जाग्रज्जागरिते स्पन्दते मायया मनः स्पन्दत इवेत्यर्थः ॥ २९ ॥