अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
advayaṃ ca dvayābhāsaṃ manaḥ svapne na saṃśayaḥ .
advayaṃ ca dvayābhāsaṃ tathā jāgranna saṃśayaḥ .. 30 ..
इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्था में अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्काल में भी निःसन्देह अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासता है ॥ ३० ॥
रज्जुरूप से सत् सर्प के समान परमार्थतः अद्वय आत्मरूप से सत् मन ही स्वप्न में द्वैतरूप से भासनेवाला है—इसमें सन्देह नहीं । स्वप्न में हाथी आदि ग्राह्य पदार्थ और उन्हें ग्रहण करनेवाले चक्षु आदि दोनों ही विज्ञान के सिवा और कुछ नहीं हैं; ऐसा ही जाग्रत् में भी है—यह इसका तात्पर्य है, क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में परमार्थ सत् विज्ञान ही समानरूप से विद्यमान है ॥ ३० ॥
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रज्जुरूपेण सर्प इव परमार्थत आत्मरूपेणाद्वयं सद्द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः । न हि स्वप्ने हस्त्यादि ग्राह्यं तद्ग्राहकं वा चक्षुरादिद्वयं विज्ञानव्यतिरेकेणास्ति । जाग्रदपि तथैवेत्यर्थः । परमार्थसद्विज्ञानमात्राविशेषात् ॥ ३० ॥
रज्जु में सर्प के समान विकल्पनारूप यह मन ही द्वैतरूप से स्थित है—ऐसा पहले कहा गया । इसमें प्रमाण क्या है? इसके लिये अन्वयव्यतिरेकरूप अनुमान प्रमाण कहा जाता है; सो किस प्रकार—
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रज्जुसर्पवद्विकल्पनारूपं द्वैतरूपेण मन एवेत्युक्तम् । तत्र किं प्रमाणमित्यन्वयव्यतिरेकलक्षणमनुमानमाह । कथम्—