अद्वैत प्रकरण - कारिका 31

मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ ३१ ॥

manodṛśyamidaṃ dvaitaṃ yatkiñcitsacarācaram .
manaso hyamanībhāve dvaitaṃ naivopalabhyate .. 31 ..


यह जो कुछ चराचर द्वैत है सब मन का दृश्य है, क्योंकि मन का अमनीभाव (संकल्पशून्यत्व) हो जाने पर द्वैत की उपलब्धि नहीं होती ॥ ३१ ॥
उस विकल्पित होनेवाले मन द्वारा दिखायी देने योग्य यह सम्पूर्ण द्वैत मन ही है—यह प्रतिज्ञा है, क्योंकि उसके वर्तमान रहने पर यह भी वर्तमान रहता है तथा उसका अभाव हो जाने पर इसका भी अभाव हो जाता है । मन का अमनीभाव—निरोध अर्थात् विवेकदृष्टि के अभ्यास और वैराग्य द्वारा रज्जु में सर्प के समान लय हो जाने पर अथवा सुषुप्तिअवस्था में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार अभाव हो जाने के कारण द्वैत की असत्ता सिद्ध ही है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३१ ॥
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तेन ही मनसा विकल्प्यमानेन दृश्यं मनोदृश्यमिदं द्वैतं सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावे भावात्तदभावेऽभावात् । मनसो ह्यमनीभावे निरोधे विवेकदर्शनाभ्यासवैराग्याभ्यां रज्ज्वामिव सर्पे लयं गते वा सुषुप्ते द्वैतं नैवोपलभ्यत इत्यभावात्सिद्धं द्वैतस्यासत्त्वमित्यर्थः ॥ ३१ ॥

तत्त्वबोध से अमनीभाव

किन्तु यह अमनीभाव होता किस प्रकार है? इस विषय में कहा जाता है—
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कथं पुनरमनीभावः? इति उच्यते—