अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम् ॥ ३२ ॥
ātmasatyānubodhena na saṅkalpayate yadā .
amanastāṃ tadā yāti grāhyābhāve tadagraham .. 32 ..
“[घटादि] वाणी से आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इस श्रुति के अनुसार मृत्तिका के समान आत्मा ही सत्य है ।
उस आत्मसत्य का शास्त्र और आचार्य के उपदेश के अनन्तर बोध होना आत्मसत्यानुबोध है । उसके कारण सङ्कल्पयोग्य वस्तु का अभाव हो जाने से, दाह्य वस्तु का अभाव हो जाने पर अग्नि के दाहकत्व के अभाव के समान, जिस समय चित्त सङ्कल्प नहीं करता उस समय वह अमनस्कता अर्थात् अमनीभाव को प्राप्त हो जाता है । ग्राह्य वस्तु का अभाव हो जाने से वह मन अग्रह अर्थात् ग्रहण-विकल्पना से रहित हो जाता है ॥ ३२ ॥
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आत्मैव सत्यमात्मसत्यं मृत्तिकावत् “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इति श्रुतेः ।
तस्य शास्त्राचार्योपदेशमन्ववबोधः—आत्मसत्यानुबोधः । तेन सङ्कल्पाभावतया न सङ्कल्पयते, दाह्याभावे ज्वलनमिवाग्नेः, यदा यस्मिन्काले तदा तस्मिन्कालेऽमनस्ताममनोभावं याति; ग्राह्याभावे तन्मनोऽग्रहं ग्रहणविकल्पनावर्जितमित्यर्थः ॥ ३२ ॥