अद्वैत प्रकरण - कारिका 33

अकल्पकमजं ज्ञानं ज्ञेयाभिन्नं प्रचक्षते ।
ब्रह्मज्ञेयमजं नित्यमजेनाजं विबुध्यते ॥ ३३ ॥

akalpakamajaṃ jñānaṃ jñeyābhinnaṃ pracakṣate .
brahmajñeyamajaṃ nityamajenājaṃ vibudhyate .. 33 ..


उस सर्वकल्पनाशून्य अजन्मा ज्ञान को विवेकीलोग ज्ञेय ब्रह्म से अभिन्न बतलाते हैं? ब्रह्म जिसका विषय है वह ज्ञान अजन्मा और नित्य है । उस अजन्मा ज्ञान से अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है ॥ ३३ ॥

अकल्पक—सम्पूर्ण कल्पनाओं से रहित अतएव अजन्मा अर्थात् ज्ञप्तिमात्र ज्ञान को ब्रह्मवेत्ता लोग ज्ञेय यानी परमार्थसत्स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न बतलाते हैं ।

अग्नि की उष्णता के समान विज्ञाता के ज्ञान का कभी लोप नहीं होता । “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है” इत्यादि श्रुतियों से यही बात प्रमाणित होती है ।

उस (ज्ञान)-के ही विशेषण बतलाते हैं—‘ब्रह्मज्ञेयम्’ अर्थात् ब्रह्म जिसका ज्ञेय है वह ज्ञान अग्नि से उष्णता के समान ब्रह्म से अभिन्न है । उस आत्मस्वरूप अजन्मा ज्ञान से अजन्मा ज्ञेयरूप आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है । तात्पर्य यह है कि नित्यप्रकाशस्वरूप सूर्य के समान नित्यविज्ञानैकरसघनरूप होने के कारण वह किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं करता ॥ ३३ ॥

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अकल्पकं सर्वकल्पनावर्जितमत एवाजं ज्ञानं ज्ञप्तिमात्रं ज्ञेयेन परमार्थसता ब्रह्मणाभिन्नं प्रचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः ।

न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽग्न्युष्णवत् “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ९ । २८) “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० २ । १ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

तस्यैव विशेषणं ब्रह्म ज्ञेयं यस्य स्वस्य तदिदं ब्रह्मज्ञेयमौष्ण्यस्येवाग्निवदभिन्नम् । तेनात्मस्वरूपेणाजेन ज्ञानेनाजं ज्ञेयमात्मतत्त्वं स्वयमेव विबुध्यतेऽवगच्छति । नित्यप्रकाशस्वरूप इव सविता नित्यविज्ञानैकरसघनत्वान्न ज्ञानान्तरमपेक्षत इत्यर्थः ॥ ३३ ॥


शान्तवृत्ति का स्वरूप

आत्मसत्य की उपलब्धि होने से संकल्प न करता हुआ चित्त, बाह्यविषय का अभाव हो जाने से, इन्धनरहित अग्नि के समान शान्त होकर निगृहीत अर्थात् निरुद्ध हो जाता है—ऐसा कहा गया । इस प्रकार मन का अमनीभाव हो जाने पर द्वैत का भी अभाव बतलाया गया । उस इस प्रकार—
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आत्मसत्यानुबोधेन सङ्कल्पमकुर्वद्ग्राह्यविषयाभावे निरिन्धनाग्निवत्प्रशान्तं निगृहीतं निरुद्धं मनो भवतीत्युक्तम् । एवं च मनसो ह्यमनीभावे द्वैताभावश्चोक्तः । तस्यैवम्—