प्रचारः स तु विज्ञेयः सुषुप्तेऽन्यो न तत्समः ॥ ३४ ॥
nigṛhītasya manaso nirvikalpasya dhīmataḥ .
pracāraḥ sa tu vijñeyaḥ suṣupte’nyo na tatsamaḥ .. 34 ..
निगृहीत—रोके हुए, निर्विकल्प—सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित और धीमान्—विवेकसम्पन्न चित्तका जो प्रचार—व्यापार है, योगियोंको उसका वह व्यापार विशेषरूपसे जानना चाहिये ।
शंका—सब प्रकारकी प्रतीतियोंका अभाव हो जानेपर जैसा व्यापार सुषुप्तिस्थ चित्तका होता है वैसा ही निरुद्धका भी होगा, क्योंकि प्रतीतिका अभाव दोनों ही अवस्थाओंमें समान है । उसमें विशेषरूपसे जाननेयोग्य कौन-सी बात है?
समाधान—इस विषयमें हमारा कहना है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें अविद्या-मोहरूप अन्धकारसे ग्रस्त हुए तथा जिसके भीतर अनेकों अनर्थप्रवृत्तिकी बीजभूत वासनाएँ लीन हैं उस मनका व्यापार दूसरे प्रकारका है और आत्मसत्यके बोधरूप अग्निसे जिसकी अविद्यारूपी अनर्थ-प्रवृत्तिका बीज दग्ध हो गया है तथा जिसके सब प्रकारके क्लेशरूप दोष शान्त हो गये हैं उस निरुद्ध चित्तका स्वतन्त्र प्रचार दूसरे ही प्रकारका है । अतः वह उसके समान नहीं है ।
इसलिये तात्पर्य यह है कि उसका ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥ ३४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
निगृहीतस्य निरुद्धस्य मनसो निर्विकल्पस्य सर्वकल्पनावर्जितस्य धीमतो विवेकवतः प्रचारो यः स तु प्रचारो विशेषेण ज्ञेयो योगिभिः ।
ननु सर्वप्रत्ययाभावे यादृशः सुषुप्तस्थस्य मनसः प्रचारस्तादृश एव निरुद्धस्यापि प्रत्ययाभावाविशेषात् किं तत्र विज्ञेयमिति ।
अत्रोच्यते—नैवम्; यस्मात् सुषुप्तेऽन्यः प्रचारोऽविद्यामोहतमोग्रस्तस्यान्तर्लीनानेकानर्थप्रवृत्तिबीजवासनावतो मनस आत्मसत्यानुबोधहुताशविप्लुष्टाविद्यानर्थप्रवृत्तिबीजस्य निरुद्धस्यान्य एव प्रशान्तसर्वक्लेशरजसः स्वतन्त्रः प्रचारः । अतो न तत्समः ।
तस्माद्युक्तः स विज्ञातुमित्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥