अद्वैत प्रकरण - कारिका 35

लीयते हि सुषुप्ते तन्निगृहीतं न लीयते ।
तदेव निर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ ३५ ॥

līyate hi suṣupte tannigṛhītaṃ na līyate .
tadeva nirbhayaṃ brahma jñānālokaṃ samantataḥ .. 35 ..


सुषुप्ति-अवस्थामें मन [अविद्यामें] लीन हो जाता है, किन्तु निरुद्ध होनेपर वह उसमें लीन नहीं होता । उस समय तो सब ओरसे चित्प्रकाशमय निर्भय ब्रह्म ही रहता है ॥ ३५ ॥

क्योंकि सुषुप्तिमें मन अविद्यादि सम्पूर्ण प्रतीतियोंकी बीजभूता वासनाओंके सहित तमःस्वभाव अविशेषरूप बीजभावको प्राप्त हो जाता है और उसके विवेक ज्ञानपूर्वक निरुद्ध किया जानेपर लीन नहीं होता, अर्थात् अज्ञानरूप बीजभावको प्राप्त नहीं होता । अतः सुषुप्त और समाहित चित्तका प्रचारभेद ठीक ही है ।

जिस समय चित्त ग्राह्य-ग्राहकरूप अविद्यासे होनेवाले दोनों प्रकारके मलोंसे रहित हो जाता है उस समय वह परम अद्वितीय ब्रह्मरूप ही हो जाता है । अतः द्वैतग्रहणरूप भयके कारणका अभाव हो जानेसे [उस अवस्थामें] वही निर्भय होता है । ब्रह्म शान्त और अभयपद है, जिसे जान लेनेपर पुरुष किसीसे नहीं डरता ।

उसीका विशेषण बतला रहे हैं—ज्ञानका अर्थ ज्ञप्ति अर्थात् आत्मस्वरूप चैतन्य है; वह ज्ञान ही जिसका आलोक यानी प्रकाश है वह ब्रह्म ज्ञानालोक अर्थात् विज्ञानैकरसस्वरूप है । समन्ततः—सब ओर अर्थात् आकाशके समान निरन्तरतासे सब ओर व्यापक है ॥ ३५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

लीयते सुषुप्तौ हि यस्मात्सर्वाभिरविद्यादिप्रत्ययबीजवासनाभिः सह तमोरूपमविशेषरूपं बीजभावमापद्यते तद्विवेकविज्ञानपूर्वकं निरुद्धं निगृहीतं सन्न लीयते तमोबीजभावं नापद्यते । तस्माद्युक्तः प्रचारभेदः सुषुप्तस्य समाहितस्य मनसः ।

यदा ग्राह्यग्राहकाविद्याकृतमलद्वयवर्जितं तदा परमद्वयं ब्रह्मैव तत्संवृत्तमित्यतस्तदेव निर्भयं द्वैतग्रहणस्य भयनिमित्तस्याभावात् ।

शान्तमभयं ब्रह्म, यद्विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ।

तदेव विशेष्यते ज्ञप्तिर्ज्ञानमात्मस्वभावचैतन्यं तदेव ज्ञानमालोकः प्रकाशो यस्य तद्ब्रह्म ज्ञानालोकं विज्ञानैकरसघनमित्यर्थः । समन्ततः समन्तात्सर्वतो व्योमवन्नैरन्तर्येण व्यापकमित्यर्थः ॥ ३५ ॥