सुप्रशान्तः सकृज्ज्योतिः समाधिरचलोऽभयः ॥ ३७ ॥
sarvābhilāpavigataḥ sarvacintāsamutthitaḥ .
supraśāntaḥ sakṛjjyotiḥ samādhiracalo’bhayaḥ .. 37 ..
जिसके द्वारा शब्दोच्चारण किया जाता है वह ‘अभिलाप’ अर्थात् ‘वाक्’ है, जो सब प्रकार के शब्दोच्चारण का साधन है, उससे रहित । यहाँ वागिन्द्रिय उपलक्षण के लिये है, अतः तात्पर्य यह है कि वह सब प्रकार की बाह्य-इन्द्रियों से रहित है ।
तथा सब प्रकार की चिन्ता से उठा हुआ है । जिससे चिन्तन किया जाता है वह बुद्धि ही चिन्ता है, उससे उठा हुआ है अर्थात् अन्तःकरण से रहित है; जैसा कि “प्राणरहित, मनोरहित और शुद्ध है तथा पर अक्षर से भी पर है” इत्यादि श्रुतियों से प्रमाणित होता है ।
क्योंकि वह सम्पूर्ण विषयों से रहित है इसलिये अत्यन्त शान्त है, सकृज्ज्योति अर्थात् आत्मचैतन्यरूप से सदा ही प्रकाशस्वरूप है, समाधि के कारण से होनेवाली प्रज्ञा से उपलब्ध होने के कारण समाधि है, अथवा इसमें चित्त समाहित किया जाता है इसलिये इसे समाधि कहते हैं, अचल अर्थात् अविकारी है और इसी से विकार का अभाव होने के कारण ही अभय है ॥ ३७ ॥
क्योंकि ब्रह्म ही ‘समाधिस्वरूप, अचल और अभय है’ ऐसा कहा गया है, इसलिये—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अभिलप्यतेऽनेनेत्यभिलापो वाक्करणं सर्वप्रकारस्याभिधानस्य, तस्माद्विगतः । वागत्रोपलक्षणार्था, सर्वबाह्यकरणवर्जित इत्येतत् ।
तथा सर्वचिन्तासमुत्थितः । चिन्त्यतेऽनयेति चिन्ता बुद्धिस्तस्याः समुत्थितोऽन्तःकरणवर्जित इत्यर्थः “अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २ ।१ ।२) इत्यादिश्रुतेः ।
यस्मात्सर्वविषयवर्जितोऽतः सुप्रशान्तः, सकृज्ज्योतिः सदैव ज्योतिरात्मचैतन्यस्वरूपेण, समाधिः समाधिनिमित्तप्रज्ञावगम्यत्वात्, समाधीयतेऽस्मिन्निति वा समाधिः, अचलोऽविक्रियः, अत एवाभयो विक्रियाभावात् ॥ ३७ ॥
यस्माद्ब्रह्मैव समाधिरचलोऽभय इत्युक्तमतः—