आत्मसंस्थं तदा ज्ञानमजाति समतां गतम् ॥ ३८ ॥
graho na tatra notsargaścintā yatra na vidyate .
ātmasaṃsthaṃ tadā jñānamajāti samatāṃ gatam .. 38 ..
वहाँ—उस ब्रह्म में न तो ग्रह— ग्रहण यानी उपादान है और न उत्सर्ग—उत्सर्जन अर्थात् त्याग ही है । जहाँ विकार अथवा विकार की विषयता (विकृत होने की योग्यता) होती है वहीं ग्रहण और त्याग भी रहते हैं; किन्तु यहाँ ब्रह्म में उन दोनों ही की सम्भावना नहीं है, क्योंकि उसमें विकार का हेतुभूत कोई अन्य पदार्थ है नहीं और वह स्वयं निरवयव है । इसलिये तात्पर्य यह है कि उसमें ग्रहण और त्याग भी सम्भव नहीं हैं । जहाँ चिन्ता नहीं है अर्थात् मनोरहित होने के कारण जिसमें किसी प्रकार की चिन्ता सम्भव नहीं है वहाँ त्याग और ग्रहण कैसे रह सकते हैं?
जिस समय भी आत्मसत्य का बोध होता है उसी समय आत्मसंस्थ अर्थात् विषय का अभाव होने के कारण अग्नि की उष्णता के समान आत्मा में ही स्थित ज्ञान अजाति—जन्मरहित और समता को प्राप्त हो जाता है ।
पहले (इस प्रकरण के दूसरे श्लोक में) जो प्रतिज्ञा की थी कि ‘इसलिये मैं समान भाव को प्राप्त, अजन्मा अकृपणता का वर्णन करूँगा’ उस पूर्वकथन का ही यहाँ ‘अजाति समतां गतम्’ ऐसा कहकर युक्ति और शास्त्रद्वारा उपसंहार किया गया है । “हे गार्गि! जो पुरुष इस अक्षर ब्रह्म को बिना जाने ही इस लोक से चला जाता है वह कृपण है” इस श्रुति के अनुसार कृपणता का विषय तो इस आत्मसत्य के बोध से भिन्न ही है । तात्पर्य यह है कि इस तत्त्व को प्राप्त कर लेनेपर तो हर कोई कृतकृत्य ब्राह्मण (ब्रह्मनिष्ठ) हो जाता है ॥ ३८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि ग्रहो ग्रहणमुपादानम्, नोत्सर्ग उत्सर्जनं हानं वा विद्यते । यत्र हि विक्रिया तद्विषयत्वं वा तत्र हानोपादाने स्यातां न तदद्वयमिह ब्रह्मणि संभवति । विकारहेतोरन्यस्याभावान्निरवयवत्वाच्च । अतो न तत्र हानोपादाने इत्यर्थः । चिन्ता यत्र न विद्यते । सर्वप्रकारैव चिन्ता न संभवति यत्रामनस्त्वात्कुतस्तत्र हानोपादाने इत्यर्थः ।
यदैवात्मसत्यानुबोधो जातस्तदैवात्मसंस्थं विषयाभावादग्न्युष्णवदात्मन्येव स्थितं ज्ञानम्, अजाति जातिवर्जितम्, समतां गतं परं साम्यमापन्नं भवति ।
यदादौ प्रतिज्ञातमतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतमितीदं तदुपपत्तितः शास्त्रतश्चोक्तमुपसंह्रियते, अजाति समतां गतमिति । एतस्मादात्मसत्यानुबोधात्कार्पण्यविषयमन्यत् “यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः” (बृ० उ० ३ ।८ ।१०) इति श्रुतेः । प्राप्यैतत्सर्वः कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवतीत्यभिप्रायः ॥ ३८ ॥