योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ॥ ३९ ॥
asparśayogo vai nāma durdarśaḥ sarvayogibhiḥ .
yogino bibhyati hyasmādabhaye bhayadarśinaḥ .. 39 ..
यह अस्पर्शयोग नामवाला है अर्थात् सर्व-सम्बन्धरूप स्पर्श से रहित होने के कारण यह उपनिषदों में अस्पर्शयोग नाम से प्रसिद्ध होकर स्मरण किया गया है । यह वेदान्त-विज्ञान से रहित सभी योगियों को कठिनता से दिखायी देता है, इसलिये उनके लिये दुर्दर्श है । तात्पर्य यह है कि यह एकमात्र आत्मसत्य के अनुभव और [श्रवण-मनन एवं प्राणायामादि] आयासों के द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है ।
क्योंकि सम्पूर्ण भय से रहित होने पर भी इस योग को आत्मनाशरूप मानने के कारण इस अभययोग में भय देखनेवाले—भय का निमित्तभूत आत्मनाश देखनेवाले अर्थात् अविवेकी योगी लोग इससे भय मानते हैं ॥ ३९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अस्पर्शयोगो नामायं सर्वसम्बन्धाख्यस्पर्शवर्जितत्वादस्पर्शयोगो नाम वै स्मर्यते प्रसिद्धमुपनिषत्सु । दुःखेन दृश्यत इति दुर्दर्शः सर्वैर्योगिभिः वेदान्तविहितविज्ञानरहितैः सर्वयोगिभिः । आत्मसत्यानुबोधायासलभ्य— एवेत्यर्थः ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मात्सर्वभयवर्जितादप्यात्मनाशरूपमिमं योगं मन्यमाना भयं कुर्वन्ति अभयेऽस्मिन्भयदर्शिनो भयनिमित्तात्मनाशदर्शनशीला अविवेकिन इत्यर्थः ॥ ३९ ॥