अद्वैत प्रकरण - कारिका 4

घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे संप्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ॥ ४ ॥

ghaṭādiṣu pralīneṣu ghaṭākāśādayo yathā .
ākāśe saṃpralīyante tadvajjīvā ihātmani .. 4 ..


घटादि के लीन होने पर जिस प्रकार घटाकाशादि महाकाश में लीन हो जाते हैं उसी प्रकार जीव इस आत्मा में विलीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥
जिस प्रकार घटादि की उत्पत्ति से घटाकाशादि की उत्पत्ति होती है और जिस प्रकार घटादि के नाश से घटाकाशादि का नाश होता है उसी प्रकार देहादि[ * ] संघात की उत्पत्ति से जीव की उत्पत्ति होती है और उनका लय होने पर जीवों का इस आत्मा में लय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वतः उनका लय नहीं होता ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा घटाद्युत्पत्त्या घटाकाशाद्युत्पत्तिः; यथा वा घटादिप्रलये घटाकाशादिप्रलयस्तद्वद्देहादिसंघातोत्पत्त्या जीवोत्पत्तिस्तत्प्रलये च जीवानामिहात्मनि प्रलयो न स्वत इत्यर्थः ॥ ४ ॥

आत्मा की असङ्गता में दृष्टान्त

सम्पूर्ण देहों में एक ही आत्मा होने पर तो एक आत्मा के जन्म-मरण और सुख-दुःखादिमान् होने पर सभी को उसका सम्बन्ध होगा तथा कर्म और फल की संकरता हो जायगी [अर्थात् कर्म किसीका होगा और उसका फल कोई और ही भोगेगा] इस प्रकार जो द्वैतवादी कहते हैं उनके प्रति कहा जाता है—

[ * ]: यहाँ ‘देह’ शब्द से लिङ्ग-देह समझना चाहिये, क्योंकि जीवत्व का नाश लिङ्ग-देह के नाश से ही हो सकता है, स्थूल-देह के नाश से नहीं ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें
सर्वदेहेष्वात्मैकत्व एकस्मिञ्जननमरणसुखादिमत्यात्मनि सर्वात्मनां तत्सम्बन्धः क्रियाफलसाङ्कर्यं च स्यादिति य आहुर्द्वैतिनस्तान्प्रतीदमुच्यते—