उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकबिन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥ ४१ ॥
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥ ४१ ॥
utseka udadheryadvatkuśāgreṇaikabindunā .
manaso nigrahastadvadbhavedaparikhedataḥ .. 41 ..
जिस प्रकार [उद्विग्नता छोड़कर] कुशा के अग्रभाग से एक-एक बूँद द्वारा समुद्र को उलीचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकार की खिन्नता का त्याग कर देने पर मन का निग्रह हो सकता है ॥ ४१ ॥
कुशा के अग्रभाग से एक-एक बूँद के द्वारा समुद्र के उत्सेचन अर्थात् सुखाने के प्रयत्न के समान अखिन्नचित्त और उद्यमशील रहनेवाले उन योगियों के मन का निग्रह भी खेदशून्य रहने से ही होता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ४१ ॥
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मनोनिग्रहोऽपि तेषामुदधेः कुशाग्रेणैकबिन्दुना उत्सेचनेन शोषणव्यवसायवद्व्यवसायवतामनवसन्नान्तःकरणानामनिर्वेदादपरिखेदतो भवतीत्यर्थः ॥ ४१ ॥
मनोनिग्रहके विघ्न
तो क्या खेदरहित उद्योग ही मनोनिग्रह का उपाय है? इस पर कहते हैं—‘नहीं’
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किमपरिखिन्नव्यवसायमात्रमेव मनोनिग्रह उपायः? न, इत्युच्यते ।