सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ ४२ ॥
upāyena nigṛhṇīyādvikṣiptaṃ kāmabhogayoḥ .
suprasannaṃ laye caiva yathā kāmo layastathā .. 42 ..
अथक उद्योगशील होकर आगे कहे जानेवाले उपाय से काम और भोगरूप विषयों में विक्षिप्त हुए चित्त का निग्रह करे, अर्थात् उसका आत्मा में ही निरोध करे । तथा, जिस अवस्था में चित्त लीन हो जाता है उस सुषुप्ति का नाम लय है, उस लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् आयासरहित स्थिति को प्राप्त हुए चित्त का भी निग्रह करे । यहाँ ‘निगृह्णीयात्’ इस पद की अनुवृत्ति की जाती है ।
यदि उस अवस्था में चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है तो उसका निग्रह क्यों करना चाहिये? इस पर कहा जाता है—क्योंकि जिस प्रकार काम अनर्थ का कारण है उसी प्रकार लय भी है; इसलिये तात्पर्य यह है कि कामविषयक मन के निग्रह के समान उसका लय से भी निरोध करना चाहिये ॥ ४२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अपरिखिन्नव्यवसायवान्सन् वक्ष्यमाणेनोपायेन कामभोगविषयेषु विक्षिप्तं मनो निगृह्णीयान्निरुन्ध्यादात्मन्येवेत्यर्थः । किं च लीयतेऽस्मिन्निति सुषुप्तो लयस्तस्मिँल्लये च सुप्रसन्नम् आयासवर्जितम् अपि इत्येतत्, निगृह्णीयादित्यनुवर्तते ।
सुप्रसन्नं चेत्कस्मान्निगृह्यत इत्युच्यते । यस्माद्यथा कामोऽनर्थहेतुस्तथा लयोऽपि । अतः कामविषयस्य मनसो निग्रहवल्लयादपि निरोद्धव्यमित्यर्थः ॥ ४२ ॥