अद्वैत प्रकरण - कारिका 43

दुःखं सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् ।
अजं सर्वमनुस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति ॥ ४३ ॥

duḥkhaṃ sarvamanusmṛtya kāmabhogānnivartayet .
ajaṃ sarvamanusmṛtya jātaṃ naiva tu paśyati .. 43 ..


सम्पूर्ण द्वैत दुःखरूप है—ऐसा निरन्तर स्मरण करते हुए चित्त को कामजनित भोगों से हटावे । इस प्रकार निरन्तर सब वस्तुओं को अजन्मा ब्रह्मरूप स्मरण करता हुआ फिर कोई जात पदार्थ नहीं देखता ॥ ४३ ॥
अविद्या से प्रतीत होनेवाला सारा द्वैत दुःखरूप ही है—ऐसा निरन्तर स्मरण करता हुआ कामभोग से—कामनानिमित्तक भोग से अर्थात् इच्छाजनित विषय से उसमें फैले हुए चित्त को वैराग्यभावना द्वारा निवृत्त करे—यह इसका तात्पर्य है । फिर ‘यह सब अजन्मा ब्रह्म ही है’ ऐसा शास्त्र और आचार्य के उपदेशानुसार निरन्तर स्मरण करता हुआ उससे विपरीत द्वैतजात को—उसका अभाव हो जाने के कारण—वह नहीं देखता ॥ ४३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें

सर्वं द्वैतमविद्याविजृम्भितं दुःखमेवेत्यनुस्मृत्य कामभोगात्कामनिमित्तो भोग इच्छाविषयस्तस्माद्विप्रसृतं मनो निवर्तयेद्वैराग्यभावनयेत्यर्थः ।

अजं ब्रह्म सर्वमित्येतच्छास्त्राचार्योपदेशतोऽनुस्मृत्य तद्विपरीतं द्वैतजातं नैव तु पश्यति, अभावात् ॥ ४३ ॥