लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ ४४ ॥
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ ४४ ॥
laye sambodhayeccittaṃ vikṣiptaṃ śamayetpunaḥ .
sakaṣāyaṃ vijānīyātsamaprāptaṃ na cālayet .. 44 ..
चित्त [सुषुप्ति में] लीन होने लगे तो उसे आत्मविवेक में नियुक्त करे, यदि विक्षिप्त हो जाय तो उसे पुनः शान्त करे और [यदि इन दोनों के बीच की अवस्था में रहे तो उसे] सकषाय—रागयुक्त समझे । तथा साम्यावस्था को प्राप्त हुए चित्त को चञ्चल न करे ॥ ४४ ॥
इस प्रकार ज्ञानाभ्यास और वैराग्य— इन दो उपायों से, लय अर्थात् सुषुप्ति में लीन हुए चित्त को, सम्बोधित अर्थात् आत्मविवेकदर्शन में नियुक्त करे । चित्त और मन—ये कोई भिन्न पदार्थ नहीं हैं । तथा कामना और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त को पुनः शान्त करे । इस प्रकार बारम्बार अभ्यास द्वारा लयावस्था से सम्बोधित और विषयों से निवृत्त किया हुआ चित्त जब अन्तरालावस्था में स्थित होकर समता को भी प्राप्त न हो तो यह समझे कि इस समय मन सकषाय—रागयुक्त अर्थात् बीजावस्था-संयुक्त है । उस अवस्था से भी उसे यत्नपूर्वक साम्यावस्था में स्थित करे । किन्तु जिस समय वह समता को प्राप्त हो अर्थात् साम्यावस्थाप्राप्ति के अभिमुख हो, उस समय उस अवस्था में उसे विचलित न करे; अर्थात् विषयाभिमुख न करे ॥ ४४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एवमनेन ज्ञानाभ्यासवैराग्यद्वयोपायेन लये सुषुप्ते लीनं सम्बोधयेन्मन आत्मविवेकदर्शनेन योजयेत् । चित्तं मन इत्यनर्थान्तरम् । विक्षिप्तं च कामभोगेषु शमयेत्पुनः । एवं पुनः पुनरभ्यस्यतो लयात्सम्बोधितं विषयेभ्यश्च व्यावर्तितं नापि साम्यापन्नमन्तरालावस्थं सकषायं सरागं बीजसंयुक्तं मन इति विजानीयात् । ततोऽपि यत्नतः साम्यमापादयेत् । यदा तु समप्राप्तं भवति समप्राप्त्यभिमुखी भवतीत्यर्थः, ततस्तन्न विचालयेद्विषयाभिमुखं न कुर्यादित्यर्थः ॥ ४४ ॥