अद्वैत प्रकरण - कारिका 45

नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ।
निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥

nāsvādayetsukhaṃ tatra niḥsaṅgaḥ prajñayā bhavet .
niścalaṃ niścaraccittamekīkuryātprayatnataḥ .. 45 ..


उस साम्यावस्था में [प्राप्त होनेवाले] सुख का आस्वादन न करे, बल्कि विवेकवती बुद्धि के द्वारा उससे निःसंग रहे । फिर यदि चित्त बाहर निकलने लगे तो उसे प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करे ॥ ४५ ॥

समाधि की इच्छावाले योगी को जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न करे अर्थात् उसमें राग न करे तो फिर कैसे रहे? निःसङ्ग अर्थात् निःस्पृह होकर प्रज्ञा—विवेकवती बुद्धि से ऐसी भावना करे कि यह जो कुछ सुख अनुभव हो रहा है वह अविद्यापरिकल्पित और मिथ्या ही है । तात्पर्य यह कि उस सुख के राग से भी चित्त का निग्रह करे ।

जिस समय सुख के राग से निवृत्त होकर निश्चलस्वभाव हुआ चित्त फिर बाहर निकलने लगे तब उसे उपर्युक्त उपाय से वहाँ से भी रोककर प्रयत्नपूर्वक आत्मा में एकाग्र करे । तात्पर्य यह है कि उसे चित्स्वरूप सत्तामात्र ही सम्पादित करे ॥ ४५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

समाधित्सतो योगिनो यत्सुखं जायते तन्नास्वादयेत्, तत्र न रज्येतेत्यर्थः । कथं तर्हि? निःसङ्गो निस्पृहः प्रज्ञया विवेकबुद्ध्या यदुपलभ्यते सुखं तदविद्यापरिकल्पितं मृषैवेति विभावयेत् । ततोऽपि सुखरागान्निगृह्णीयादित्यर्थः ।

यदा पुनः सुखरागान्निवृत्तं निश्चलस्वभावं सन्निश्चरद्वहिर्निर्गच्छद्भवति चित्तं ततस्ततो नियम्योक्तोपायेनात्मन्येवैकीकुर्यात्प्रयत्नतः । चित्स्वरूपसत्तामात्रमेवापादयेदित्यर्थः ॥ ४५ ॥